अर्पण का महत्त्व !

बालमित्रो, प.पू. टेंबेस्‍वामीजी बहुत बडे संत थे । उनका नाम वासुदेव था । उनके पिताजी का नाम गणेशभट्ट और माताजी का नाम रमाबाई था ।

महाराष्‍ट्र में नृसिंहवाडी दत्तात्रय देवालय एक प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र है । इस क्षेत्र में आने के बाद श्री टेंबेस्‍वामीजी वासुदेवानंद सरस्‍वतीजी के नाम से पहचाने जाने लगे ।

आज हम टेंबेस्‍वामीजी की यह कथा सुनते हैं ।

यह उस समय की बात है जब श्री टेंबेस्‍वामीजी नृसिंहवाडी में थे । गांव में रामदास नाम का एक दर्जी रहता था । रामदास बहुत अच्‍छा कारीगर था, परंतु कोई भी उसके यहां कपडे सिलवाने के लिए नहीं आता था । कई बार ऐसे भी होता था कि कोई ग्राहक उसके दुकान की सीढी तक आता था और वहीं से वापस लौट जाता था ।

रामदास समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा क्‍यों होता है ? मैंने किसी का क्‍या बिगाडा है जो कोई भी मुझसे कपडे नहीं सिलवाना चाहता । यह सोचकर उसका मन दुखी हो जाता था । दुकान में कोई कपडे सिलवाने के लिए नहीं आता था, इसलिए उसे घर चलाना कठिन हो रहा था । काम न मिलने के कारण धीरे-धीरे उसके पैसे भी कम होते जा रहे थे । उसपर कुछ उपाय भी नहीं सूझ रहा था ।

एक दिन रामदास टेंबेस्‍वामीजी के दर्शन करने के लिए गया । उसने स्‍वामीजी को बताया कि वह अच्‍छे कपडे सिलता है, परंतु कोई उससे कपडे सिलवाने नहीं आता तथा इस कारण उसका घर चलना कठिन हो रहा है । स्‍वामीजी उसकी पूरी बात आंखे बंद कर सुन रहे थे । रामदास का कहना पूरा होने के बाद स्‍वामीजी ने कहा, ‘रामदास, तुम मुझे सौ मुद्राएं अर्पण करो ।’

स्‍वामीजी के मुख से यह बात सुनकर रामदास चकित हो गया । उस समय सौ मुद्राआें का मूल्‍य बहुत था । रामदास सोचने लगा कि मेरे पास काम नहीं है, घर चलाना कठिन है इसलिए मैं उपाय पूछने आया हूं । अब स्‍वामीजी को इतना धन कहां से लाकर दूं ? स्‍वामीजी को अर्पण की क्‍या आवश्‍यकता है ? वे मुझे उपाय न बताकर मुझसे ही धन मांग रहे हैं । यह बडी दुविधा का समय है ।

रामदास ने स्‍वामीजी से नम्रता से कहा, ‘स्‍वामीजी, मेरी दुकान नहीं चलती, मेरे पास धन भी नहीं बचा है तो मैं इतना धन कहांसे लाऊंगा ?

स्‍वामीजी ने अत्‍यंत शान्‍त आवाज में कहा, ‘रामदास, तुम गांव में जाकर सौ मुद्राएं इकठ्ठा करो । चिंता ना करो, तुम्‍हें मुद्राएं मिलेंगी । वह धन तुम मुझे अर्पण करना । तुम्‍हारी सारी समस्‍याएं दूर हो जाएंगी ।’

स्‍वामीजी के वचन पर श्रद्धा रखकर रामदास सौ मुद्राएं एकत्रित करने चला गया । शामतक उसने जिनसे सहायता मांगी, उन सभीने उसे पैसे दे दिए । अब रामदास के पास सौ मुद्राएं एकत्रित हो गई थीं । उसे बहुत आश्‍चर्य हुआ, क्‍योंकि इससे पहले जब वह किसी से सहायता मांगता था, तब सब लोग उसे टाल देते थे और कोई उसकी सहायता नहीं करता था । आज ऐसा क्‍या हुआ कि सभीने सहायता की ? उसी आनंद में वह स्‍वामीजी के पास गया । उसे देखकर स्‍वामीजी बोले, ‘क्‍यों रामदास, आज सभीने धन दे दिया है न ?’ रामदास ने कहा, ‘हां स्‍वामीजी, इतना धन मैं एक दिन में जुटा पाया, यह तो जैसे चमत्‍कार ही हो गया ।’ स्‍वामीजी को नमस्‍कार कर रामदास ने वह मुद्राएं स्‍वामीजी के चरणों में रख दीं । स्‍वामीजी बोले, ‘रामदास कल से तुम्‍हारी दुकान में इतना काम आएगा कि तुम्‍हें पूरा दिन भी कम पडेगा ।’ वैसा ही हुआ और रामदास की दुकान पर इतनी भीड रहने लगी की उसे पूरा दिन भी कम पडने लगा ।

एक दिन समय निकालकर रामदास स्‍वामीजी के दर्शन के लिए गया । उसने पूछा, ‘स्‍वामीजी, आपने सौ मुद्राएं लेकर ऐसा क्‍या किया कि मेरी सारी चिंताएं दूर हो गई ।’

स्‍वामीजी ने कहा, ‘रामदास तुमने पिछले जनम में अपने एक मित्र से सौ मुद्राएं ली थीं । वे मुद्राएं तुमने उसे वापस नहीं की थी । वह लौटाने से पहले ही तुम्‍हारे उस मित्र की मृत्‍यु हो गई । मृत्‍यु के समय उसके मन में यह बात थी कि तुमने उसका धन वापस नहीं दिया है । उसकी इच्‍छा अधूरी रह जाने के कारण इस जनम में वह शक्‍ति सूक्ष्म से तुम्‍हारी दुकान की दहलीज पर बैठती थी । दुकान की ओर आनेवाले ग्राहक के मन में भी वापस जाने का विचार डालती थी । इन बातों के कारण तुम्‍हारा काम बंद होने लगा था । तुमने जब सौ मुद्राएं अर्पण में दी, तो मैंने वह भगवान के चरणों में रखी और उसका सारा लेन-देन पूरा कर दिया । ऐसा करते ही वह शक्‍ति वापस चली गई और तुम्‍हारा काम अच्‍छे से चलने लगा ।’

तो बच्‍चो इससे ध्‍यान में आता है कि संत कैसे हमारे सारे जनमों की बात जानते हैं । यह भी ध्‍यान में आता है कि, यदि किसी से कुछ उधार लिया हो, तो उसे लौटाना ही पडता है । ईश्‍वर अथवा संतों के चरणों में अर्पण करने से हमारा लेन-देन पूरा हो जाता है और ईश्‍वर को अर्पण करने से नया लेन-देन भी निर्माण नहीं होता ।

Leave a Comment