नवरात्रि

मित्रो, शास्त्र के अनुसार नवरात्रि उत्सव मनाकर देवताओं की कृपा संपादन करें !

‘विद्यार्थी मित्रो, हम हिंदू संस्कृति के अनुसार अनेक त्यौहार तथा उत्सव मनाते हैं । त्यौहार मनाना, यह देवताओं की भक्ति कर आनंदमय जीवन यापन करने का सीधा एवं सुलभ मार्ग है । प्रत्येक को देवताओं की शक्ति एवं उनका अस्तित्व प्रतीत होता है । हम सब आनंदमय हों और आदर्शमय जीवन व्यतीत करें, इस हेतु ईश्वर ने उत्सवों की निर्मिति की है; अपितु वर्तमान में ये सर्व उत्सव शास्त्र के अनुसार एवं योग्य पद्धति से कैसे मनाएं और उसका शास्त्र हमें ज्ञात नहीं, इसलिए त्यौहार एवं उत्सव में अनेक अनुचित प्रकार चल रहे हैं । नवरात्र उत्सव कैसे मनाएं तथा देवताओं की कृपा कैसे संपादन करें, यह देखेंगे ।

१. नवरात्रि का शास्त्र

नवरात्रि में हम महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती की उपासना करते हैं । हम इन नौ दिनों में आरंभ के तीन दिन महाकाली, इसके उपरांत के तीन दिन महालक्ष्मी तथा अंतके तीन दिन महासरस्वती की उपासना करते हैं । अब हम विविध देवताओं की उपासना करने का शास्त्र देखेंगे ।

२. नवरात्रि के नौ दिनों में क्रमश: महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती इन देवताओं की पूजा करने के पीछे का शास्त्र

२ अ. नवरात्र के पहले तीन दिन महाकालीदेवी की उपासना करने का शास्त्र

२ अ १. स्वभावदोष तथा दुर्गुण, ये जीवन दुःखी एवं तनाव युक्त बनानेवाले शत्रु हैं : हमारे जीवन के संकटों का निवारण होकर शत्रुओं का नाश हो, इस हेतु हम महाकाली की उपासना करते हैं । मित्रो, अपने विद्यार्थी जीवन में हमारे शत्रु कौन हैं, जिस शत्रु से हमारा जीवन दुःखी बनता है तथा हम तनाव युक्त रहते हैं ? मित्रो, स्वभावदोष तथा दुर्गुण ये हमारे शत्रु हैं । जिन बच्चो में दुर्गुण अधिक होते हैं, वे बच्चे आनंदमय नहीं रह सकते । इसके कुछ उदाहरण देखेंगे !

२ अ १ अ. झगडालू : जिस बच्चे में ‘झगडालू’ यह दोष हो, तो उसके अनेक शत्रु होंगे । इससे यह विद्यार्थी आनंदमय रह सकता है क्या ? अर्थात उसका मुख्य शत्रु उसका‘ झगडालू’ यह दोष है । हमारे दोष ही हमारे शत्रु हैं, उसके निर्मूलन के लिए हम महाकाली देवी से प्रार्थना करेंगे ।

२ अ १ आ. आलस : जब किसी बच्चे में आलस यह दोष हो, तो वह पढाई समय पर पूर्ण नहीं करेगा । उसके मनपर अधिक तनाव एवं डर होगा । इस बच्चे का शत्रु ‘आलस’ यह दोष है ।

२ अ २. बच्चो, स्वभावदोष दूर होने के लिए महाकाली माता से प्रार्थना करें : मित्रो, हमें आनंदमय जीवन से दूर ले जानेवाले शत्रु हमारे स्वभावदोष ही होते हैं । इसलिए हम नवरात्रि के प्रथम तीन दिन महाकाली देवी से प्रार्थना करेंगे, ‘हे महाकालीमाता, मुझे आनंदमय जीवन से दूर रखनेवाले शत्रु मेरे दोष हैं, इसकी मुझे भान रहने दें और उसके निर्मूलन के लिए मुझसे सातत्य से प्रयत्न होने दें’, ऐसी आपके चरणो में प्रार्थना है । मित्रो, हम देवी को दोष निवारण करने का वचन देंगे और सभी इसके लिए प्रयत्न करेंगे ।

२ आ. नवरात्रि में तीन दिन महालक्ष्मीदेवी की उपासना करने का शास्त्र : मित्रो, ये देवी मां हमें सुख, शांति और समाधान प्रदान करती हैं । इसलिए महालक्ष्मी की उपासना करें ।

२ इ. नवरात्रि के अंतिम तीन दिन सरस्वतीदेवी की उपासना करने का शास्त्र

नमस्ते शारदे देवि वीणापुस्तकधारिणि ।
विद्यारम्भं करिष्यामि प्रसन्ना भव सर्वदा ॥

अर्थ : हाथ में वीणा और ग्रंथ धारण की हुई हे सरस्वती देवी आपको वंदन कर मैं अध्ययन प्रारंभ करता/करती हूं आप मुझ पर सदैव प्रसन्न रहें ।

२ इ १. बच्चो, विद्यार्थी ज्ञान एवं कला के उपासक होने से सरस्वती देवी की उपासना करें : नवरात्रि के अंतिम तीन दिन में सरस्वतीदेवी की शक्ति अधिक कार्यरत होने से हम उनकी उपासना करते हैं । मित्रो, सरस्वती मां कला एवं ज्ञान देनेवाली देवी हैं । इन तीन दिनों में हमें स्वयं में गुण बढाने के लिए प्रयत्न करने चाहिए; वह इसलिए कि गुणवृदि्ध हुए बिना ज्ञान एवं कला अवगत नहीं होती है । इसलिए हम इन दिनों में गुणसंवर्धन की प्रतिज्ञा करें, तभी सरस्वती माता की हमपर कृपा होगी । यह देवीमां विद्यार्थी जीवन में अत्याधिक महत्त्वपूर्ण होने से हम इनकी प्रतिदिन विद्यालय में प्रार्थना करते हैं । विद्यार्थी ज्ञान एवं कला का उपासक है । इन तीन दिनों में सरस्वतीदेवी की शक्ति अधिक कार्यरत होती है, इसलिए हम उनकी उपासना करेंगे ।

२ इ २. सरस्वतीदेवी की शास्त्रीय जानकारी : इनकी कृपा पाने के लिए हम में निम्नगुण होने आवश्यक हैं ।

२ इ २ अ. सीखने की वृत्ति : मित्रो, जो निरंतर सीखने की स्थिती में होता है, उस पर सरस्वती माता प्रसन्न होती हैं । हमें सर्व विषयों का ज्ञान नहीं होता । हममें औरों से सीखने की वृत्ति हो, तो हम विविध व्यक्ति एवं वस्तु से कुछ सीख सकते हैं; वह इसलिए कि प्रत्येक में विविध गुण, ज्ञान तथा कला होती है । हमारी कक्षा में किसी की चित्रकला अच्छी होती है, तो कोई अच्छे गीत गाता है, कोई गणित में अच्छा है । सीखने की वृत्ति होगी, तो अपनी कक्षाके सर्व बच्चों से अनेक बातें सीख सकते हैं ।

२ इ २ आ. तीव्र लगन : ज्ञान एवं कला प्राप्त करने की तीव्र लगन हम में होनी चाहिए । मुझे कितनी भी बाधा आएं, तब भी मैं ज्ञान प्राप्त करूंगा, ऐसी लगन हममें हो, इसलिए हम सरस्वती माता से प्रार्थना करें ।

२ इ २ इ. मार्गदर्शन लेना : ज्ञान एवं कला प्राप्त करने के लिए हम सतत उस क्षेत्र जानकार व्यक्तियों का मार्गदर्शन लेना चाहिए ।

२ इ २ ई. दृढ निश्चय : कोई ज्ञान आकलन होने तक सातत्य से प्रयत्न करते रहना, इसे दृढ निश्चय कहते हैं । कई बच्चे कुछ बातें यदि न हो पा रही हों, तो वे तुरंत छोड देते हैं । उन्हें ऐसा लगता है कि कोई भी बात ‘झटपट मिलनी चाहिए ।’, बालमित्रो, कोई भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए दृढता चाहिए । इस नवरात्रोत्सव के काल में यह गुण स्वयं में लाने का निश्चय करें ।

२ इ २ उ. धर्माचरण : कुछ बच्चे अधिक गुण प्राप्त करने के लिए दूसरों की नकल करते हैं । यह एक प्रकार से चोरी होकर अधर्म ही है । ऐसे छात्रोंपर सरस्वतीदेवी कभी प्रसन्न नहीं होती । यदि हम धर्माचरण करेंगे, तो सरस्वती माता की कृपा होगी । हे सरस्वतीमाता, ‘मुझसे सदैव धर्माचरण हो । माता, आजसे हम इस विकृति को नष्ट करने का निश्चय कर रहे हैं’, ऐसी प्रार्थना करें ।

२ इ २ ऊ. विनम्रता : नम्रता के बिना हम ज्ञान एवं कला ग्रहण नहीं कर सकते ‘विद्याविनयेन् शोभते’, ऐसे कहते हैं । सरस्वतीदेवी को नम्र छात्र बहुत अच्छे लगते हैं । मित्रों हमें देवीमाता के लाडले बनना हैना ? हम यह गुण स्वयं में लाने का निश्चय करेंगे तथा आज से हम नम्रता से आचरण करने की प्रतिज्ञा करेंगे ।

२ इ २ ए. हमें प्राप्त ज्ञान औरों को देना : मित्रों, हमें कोई कला तथा ज्ञान प्राप्त हो,तो उसे औरों को देने में ही खरा आनंद होता है । कई बच्चे दूसरों को कुछ बताते नहीं, सिखाते नहीं । इन्हें स्वार्थी कहते हैं, ऐसे छात्र सरस्वतीमाता को अच्छे नहीं लगते । मित्रो, आजसे उक्त गुण स्वयं में लाने का प्रयत्न करें, तभी खरे अर्थ से नवरात्रोत्सव मनाने समान होगा ।

२ इ ३. श्री सरस्वतीदेवी की मूर्ति की विशेषताएं

२ इ ३ अ. मूर्ति के चार हाथ : चार हाथ ये दिशा दर्शक हैं और यह दर्शाते हैं कि देवी माता सर्वव्यापी हैं ।

२ इ ३ आ. हाथ में होनेवाले ग्रंथ : देवीमां भी ज्ञानप्राप्ति का साधन हैं । उनकी उपासना से हमें ज्ञानप्राप्ति होती है ।

२ इ ३ इ. हाथों की जपमाला : ये एकाग्रता का प्रतीक है । एकाग्रता होने से हम ज्ञान शीघ्र ग्रहण कर सकते हैं ।

२ इ ३ ई. वीणा : वीणा संगीत में होनेवाला एक वाद्य है । संगीत सुनने से हमें आनंद होकर शांति प्रतीत होती है ।ज्ञानप्राप्ति होनेपर हम आनंदमय जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव ले सकते हैं ।

२ इ ३ उ. देवीमाता के अनेक अलंकार : अलंकार ऐश्वर्य का प्रतीक है । देवीकी उपासना से हमें ऐश्वर्य प्राप्त होता है ।

बालमित्रो, आज हम सरस्वतीमाता की उपासना करने के लिए आवश्यक गुण देखेंगे । अबतक हमने सरस्वतीमाता द्वारा हाथ में ली हुई वस्तुओं का अर्थ देखा । हम यह सब जानकारी औरों को बताएंगे । बच्चो, अधिक जानकारी के लिए ‘सनातन संस्था’ का ‘सरस्वती’, नामक लघुग्रंथ पढ सकते हैं ।

३. देवता एवं उनका कार्य

अ. श्री महासरस्वती – सृष्टी की निर्मिति

आ. श्री महालक्ष्मी – पालनपोषण

इ. श्री महाकाली – संकटनिवारण एवं शत्रुओं का नाश

४. देवीपूजा का शास्त्र

४ अ. गंध : देवी को अनामिका से गंध लगाएं

४ आ. देवता एवं उनका तत्त्व आकृष्ट करनेवाले फूल

श्री दुर्गादेवी मोगरा
श्री लक्ष्मी गुलाब
श्री सरस्वती रातरानी
श्री भवानी भुईकमल
श्री अंबामाता पारिजात

१. देवीमाता को फूल एक अथवा नौकी गुना में एवं गोलाकार चढाएं।

२. देवी को मोगरा इत्र लगाएं ।

३. देवीमाता की एक अथवा नौ की गुना में प्रदक्षिणा करें ।

४ इ. देवता एवं उन्हें आकर्षित करनेवाले रंग

श्री दुर्गादेवी लाल
श्री लक्ष्मी पीला
श्री सरस्वती सफेद
श्री कालिका जामुनी

४ ई. देवी अष्टभुजा होने का शास्त्र : अष्टभुजा देवी के हाथों में आयुध होते हैं । अष्टभुजा देवी, ये देवी का मारक रूप है । वे अष्टदिशाओं की रक्षा करनेवाली हैं ।

४ उ. देवी से जोगवा मांगना : जोगवा मांगना, यह एक प्रकार की दास्यभक्ति है । इसमें देवी को शरण जाकर स्वयं को भूलना होता है एवं अपना अहंकार न्यून होता है । ‘देवी, मैं तुम्हारा दास हूं, ऐसा भाव उत्पन्न होता है ।

४ ऊ. देवीमाता के अलंकारों का महत्त्व : मित्रों, अपने भारतीय संस्कृति के अनुसार प्रत्येक नारी, देवी का ही रूप होती है । देवीने सर्व अलंकार परिधान किए हैं प्रत्येक अलंकार में उस नारी को देवीमाता की शक्ति मिले, देवी की कृपा सदैव प्राप्त हो, इसलिए देवीने नारियों को अलंकाररूपी सुरक्षाकवच दिया है किंतु वर्तमान में आधुनिकता के नामपर बहुत सी लडकियां अलंकार धारण नहीं करती हैं ।

– श्री. राजेंद्र पावसकर (गुरूजी), पनवेल.