निराशा अथवा परीक्षा में असफल होने पर आत्महत्या का विचार करना, मूर्खता है!

कुछ वर्षों पूर्व माध्यमिक अथवा महाविद्यालयीन परीक्षाओं के परिणाम घोषित होनेपर असफल द्यार्थियोंद्वारा आत्महत्या के गिने-चुने समाचार सुनने को मिलते थे । अब तो प्रेम में असफलता, निराशा, पढाई का तनाव, माता-पिताके कठोर वचन, कोई बात मन के अनुसार न होना आदि कारण से भी विद्यार्थी आत्महत्या करते हैं ! वर्ष २०१० के आरंभ में ४७१ से भी अधिक विद्यार्थियों ने आत्महत्या की ।

आत्महत्या का विचार अनुचित क्यों ?

‘आत्महत्या करना’, किसी समस्या का उपाय नहीं,  अपितु वह शुद्ध पलायनवादिता एवं कायरता है । आत्महत्या का विचार करनेवाले बच्चे निम्नलिखित विचार करें :

१. आत्महत्या का केवल एक ही कारण होता है, जबकि जीने के अनेक कारण होते हैं ।

२. जन्मदातामाता-पिता के प्रेमका अनुभव करना है ।

३. छ. शिवाजी महाराज, लो. तिलक, स्वा. सावरकर जैसे राष्ट्रपुरुष; तथा संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम महाराज जैसे संतों को भी अनेक कष्ट सहने पडे थे । उनकी तुलना में आपको होनेवाला कष्ट कितना है इसका विचार करें ? आज जो दुःख भोगने पड रहे हैं, काल के प्रवाह में वे भी नष्ट हो जाएंगे !

४. मुझे मित्र-मंडली के साथ खेलने का आनंद लुटना है ।

५. मेरे देश में अनेक सुंदर बातें हैं जिन्हें मुझे देखना है ।

६. मुझे आस-पासकी प्रकृति तथा लोगोंसे नयी-नयी बातें सीखना हैं ।

७. जन्मदातामाता-पिता को वृध्दावस्था में संभालने का दायित्व मुझपर है ।

आत्महत्या का वास्तविक उपाय है ‘साधना’!

विद्यार्थी आत्महत्या के लिए प्रवृत्त होते हैं, इसका वास्तविक कारण है ‘मनकी दुर्बलता ।’ ध्यानधारणा, नामजप आदि ‘साधना’ करने से ही मनोबल बढता है एवं जीवन में स्थिरता आती है । ऐसे विद्यार्थी आत्महत्या के विचारपर सहजता से विजय प्राप्त कर सकते हैं । इस प्रकार के प्रयोग विभीन्न महाविद्यालयो में किये गये हैं । इस प्रयोग के कारण उन्हें अभ्यास करने में अधिक लाभ मिला है । इसलिए बच्चो मनोबल बढाने के लिए आज से ही साधना आरंभ करो ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘ सुसंस्कार एवं उत्तम व्यवहार’