संत ज्ञानेश्वरजी

संत ज्ञानेश्वर अर्थात महाराष्ट्र का एक अनमोल रत्न ! महाराष्ट्र के सांस्कृतिक जीवन के, पारमार्थिक क्षेत्र के ‘न भूतो न भविष्यति’ऐसा बेजोड व्यवितमत्व एवं अलौकिक चरित्र अर्थात संतज्ञानेश्वर! गत लगभग ७२५ वर्षां से महाराष्ट्र की सभी पीढीयों के, समाज के सभी स्तर के लोगोने जिस व्यक्तिमत्व को अपने मन मंदिर में एक अटल श्रद्धास्थान के रूपमें रखा है; तथा जो श्रद्धास्थान आगामी असंख्य पीढियोंतक स्थायीरूप से अटल एवं उच्चस्थान पर रहनेवाला है; ऐसा एकमेवाद्वितीय व्यवितमत्व अर्थात संत ज्ञानेश्वर !

ब्रह्म साम्राज्य चक्रवर्ती, मति गुंठित करनेवाली अलौकिक काव्य प्रतिभासंपन्न रससिद्ध महाकवी, महान तत्त्वज्ञ, श्रेष्ठ संत, सकल विश्व के कल्याण की चिंता करनेवाला भूतदयावादी परमेश्वरभक्त, पूर्ण ज्ञान का मूर्तिमंत प्रतीक, श्रीविठ्ठल का प्राणसखा – ऐसे शब्दो में उनका वर्णन किया जाता है; परंतु ऐसा लगता है कि, उनका परिपूर्ण वर्णन करने के लिए शब्द संग्रह भी अपूर्ण है । संत चोखामेला आगे दिए गए शब्दों में उन्हें वंदन करते हैं ।

‘कर जोडोनिया दोन्ही। चोखा जातो लोटांगणी।।
महाविष्णूचा अवतार। प्राणसखा ज्ञानेश्वर।।’

संत चोखोबाने (तेरहवे शतक में) प्राणसखा’ इस अत्यंत बिरले (अलग), सुंदर एवं समर्पक शब्द का उपयोग संत ज्ञानेश्वर के लिए किया है ।

‘शूचीनाम श्रीमतां गेहे, योगभ्रष्टोऽभिजायते’(भगवद् गीता ६.४१) ऐसे पवित्र कुल में उनका जन्म आपेगांव में तेरहवे शतक में, श्रावण कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि में, शके११९७ (इ.स. १२७५) को हुआ । उनके पिता का नाम विठ्ठलपंत कुलकर्णी एवं माता का नाम रुख्मिणीबाई था । गोविंदपंत तथा मीराबाई उनके दादा-दादी थे । निवृत्तीनाथ, संत ज्ञानेश्वर के अग्रजबंधु थे । निवृत्तीनाथ, सोपान तथा मुक्ताबाई ये उनके भाई-बहन थे इनका जन्म क्रमशः शक ११९५, ११९९, एवं १२०१ में हुआ । (कुछ अभ्यासकों के अनुसार निवृत्तीनाथ, ज्ञानदेव, सोपान तथा मुक्ताबाई इन सभी का जन्म आळंदी में ही शाक ११९०, ११९३, ११९६ एवं ११९९ इस अनुक्रम मे हुआ ।) आपेगाव यह औरंगाबाद जिले में पैठण के पास गोदावरी नदी के किनारे बसा हुआ एक छोटासा गाव है । श्री. विठ्ठलपंत मूलतः विरक्त थे । उन्होंने सन्यास लेने के उपरांत गुरु की आज्ञानुसार पुन: गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया । उनकी चार संताने हुर्इं । श्री निवृत्तीनाथ, ज्ञानदेव, सोपान एवं मुक्ताबाई ऐसे उनके नाम थे । विठ्ठलपंत तीर्थ यात्रा करते करते श्री क्षेत्र आळंदी में आकर रहने लगे, तथा वहीं स्थायिक हो गये । अलंकापुरी (आळंदी) यह सिद्धपीठ था । उसकाल में सन्यासी के बच्चे जानकर सर्व समाज इन चारों भाई-बहनों का उपहास करता था । परित्यक्त ब्राह्मण के रूपमें उन्हें समय बिताना पडा । संत ज्ञानेश्वरजी के माता-पिताने देहांत प्रायाश्चित्त लिया ।

श्री निवृत्तीनाथ ही संत ज्ञानेश्वर के सदगुरु थे । उन्होंने नेवासा क्षेत्र में अपने सदगुरु के कृपाशीर्वाद से भगवद् गीतापर प्रख्यात सारांश ग्रंथ लिखा । इस ग्रंथ को ‘ज्ञानेश्वरी’ या ‘भावार्थ दीपिका’ कहते हैं । संत ज्ञानेश्वर ने, ज्ञानेश्वरी के माध्यम से संस्कृत भाषाका ‘ज्ञान’, प्राकृत भाषा में प्रस्तुत किया ।

माझा मराठाचि बोलू कौतुके।
परि अमृतातेहि पैजासी जिंके।
ऐसी अक्षरे रसिके। मेळवीन।।
(ज्ञानेश्वरी – ६.१४)

ऐसा कहकर उन्होंने मराठी भाषा का अभिमान, मराठी की महत्ता व्यक्त की है । यह ज्ञानेश्वरी सभी वर्ग के लोगों को मोहित करती है । ‘पसायदान’ यह विश्वकल्याण की प्रार्थना याने संत ज्ञानेश्वर के वैश्विक सद्भावना का, उसी प्रकार प्रतिभा का साक्षात्कारहै । कर्मयोग, ज्ञानयोग व भक्तियोग बतानेवाले ग्रंथराज ज्ञानेश्वरी में लगभग ९००० पद (ओव्या) हैं । ऐसा माना जाता है कि, यह ग्रंथ इ. स. १२९० में लिखा गया । इसके लिए संत नामदेव महाराज कहते हैं,

‘नामा म्हणे ग्रंथ श्रेष्ठ ज्ञानदेवी।
एक तरी ओवी अनुभवावी।।’

उनका दूसरा ग्रंथ ‘अनुभवामृत’ अथवा ‘अमृतानुभव’ है, जो विशुद्ध तत्वज्ञान का, जीव-ब्रह्म के मिलन का ग्रंथ है । ‘चांगदेव पासष्टी’ इस ग्रंथ द्वारा उन्होंने चांगदेव का गर्वहरण कर उन्हें उपदेश किया । ऐसा माना जाता है कि, महान योगी चांगदेव १४०० वर्ष जीवित थे, फिर भी उनका अहंकार समाप्त नहीं हुआ था । इसीलिए संत ज्ञानेश्वर ने उपदेशात्मक लिखा हुआ ६५ दोहों का ग्रंथ अर्थात चांगदेव पासष्टी यह ग्रंथ है । इसमें अद्वैत का अप्रतिम दर्शन है । संत ज्ञानेश्वर का ‘हरिपाठ’(अभंगात्मक, २८ अभंग) यह नामपाठ है । इसमे हरिनाम का महत्त्व बताया है । ज्ञानदेव के साथ ही उनके सभी भाई-बहनो पर तत्कालीन समाज ने प्रचंड अन्याय किया, परंतु उस अन्याय की छोटीसी प्रतिक्रिया भी उनके साहित्य में दिखाई नहीं देती , यह विशेष है !

‘ज्ञानदेव अर्थात मराठी माता का हृदय ! अखिल विश्व की चिंता करनेवाले संत ज्ञानेश्वर को वारकरी संप्रदाय सहित सभी भक्त प्रेमसे ‘माउली’ कहते हैं । उन्होंने धर्म के क्लिष्ट आडंबर हटाकर धर्म को कर्तव्य का अलग अर्थ दिया । वाङ्मय निर्मिती के साथ ही उन्होंने आध्यात्मिक लोकतंत्र का बीज बोने का यशस्वी प्रयत्न चंद्रभागा के तटपर किया है ।

भागवत धर्म की तथा वारकरी संप्रदाय की नींव रखने का अभूतपूर्व कार्य उन्होंने किया । संत नामदेव, संत गोरोबा कुंभार, संत सावतामाळी, संत नरहरी सोनार, संत चोखामेळा इन समकालीन दैदिप्यमान संतों का अनौपचारिक नेतृत्व करते हुए , संत ज्ञानेश्वर ने अध्यात्म के क्षेत्र मे समानता प्रस्थापित करने का प्रयत्न किया ।

अर्थात संतवर्य ज्ञानदेवजी ने २१वे वर्ष की अल्पायु में ही आळंदी में इंद्रायणीनदी के पावनतीर पर संजीवन समाधी ले ली, (कार्तिक वद्य त्रयोदशी, शके १२१८, दूमात्र्१âखनाम संवत्सर, इ.स.१२९६, गुरुवार)। इस‘ज्ञानसूर्य’के अस्त होने के उपरांत एक वर्ष के भीतर ही निवृत्ति, सोपानतथा मुक्ताबाई इन भाई-बहिनोंने भी अपनी इहलोक की यात्रा समाप्त की।