श्री संत गोरा कुम्हार (इ.स. १२६७ ते १३१७)

तेरेडो की गांव में गोरा कुम्हार नामक एक विठ्ठलभक्त था । कुम्हार का काम करते समय भी वह निरंतर पांडुरंग के भजन में तल्लीन रहता था । पांडुरंग के नामजप में वह सदा मग्न होता था ।एक बार उसकी पत्नी अपने इकलौते छोटे बच्चे को आंगन में रखकर पानी भरने गई श्री संत । उस समय गोरा कुम्हार मटके बनाने के लिए आवश्यक मिट्टी पैरों से मिलाते हुए पांडुरंग का भजन कर रहा था । उसमें वह अत्यंत तल्लीन हुआ था । बाजू में ही खेल रहा छोटा बच्चा रेंगते हुए आया और उस मिट्टी की ढेर में गिर गया । गोरा कुम्हार अपने पैरों से मिट्टी ऊपर-नीचे कर रहा था । मिट्टी के साथ उसने अपने बच्चे को भी रौंद डाला । मिट्टी रौंदते समय पांडुरंग के भजन में मग्न होने के कारण बच्चे का रोना भी उसे सुनाई नहीं दिया ।

पानी भरकर आने के उपरांत उसकी पत्नी बच्चे को ढूंढने लगी । बालक दिखाई नहीं देनेपर वह गोरा कुम्हार के पास गई । इतने में उसकी दृष्टि कीचड में गई, कीचड रक्त से लाल हुआ देखकर उसे समझमें आया कि बालक रौंदा गया है । वह जोर से चीख पडी और अपने पतिपर बहुत क्रोध किया । अनजाने में हुए इस कृत्य का प्रायश्चित समझकर गोरा कुम्हारने अपने दोनों हाथ तोड डाले । उसी कारण उसका कुंभकार का व्यवसाय बैठ गया । तब भगवान विठ्ठल-रखुमाई मजदूर बनकर उनके घर में आकर रहने लगे । पुन: उसका कुम्हार का व्यवसाय फलने फूलने लगा ।

कुछ दिनों बाद आषाढी एकादशी आई । श्री ज्ञानेश्वरजी और श्री नामदेवजी यह संतमंडली पंढरपूर जाने निकली । मार्ग में तेरेडोकी में आकर श्री ज्ञानेश्वरजीने गोरा कुम्हार तथा उसकी पत्नी को पंढरपुर में अपने साथ लेकर गए ।गरुड पारपर नामदेवजी का कीर्तन हुआ । ज्ञानेश्वरजी के समेत सर्व संतमंडली कीर्तन सुनने बैठी । गोरा कुम्हार भी अपने पत्नी के साथ कीर्तन सुनने बैठे । कीर्तन के समय लोग हाथ ऊपर उठाकर तालियां बजाने लगे । विठ्ठल नाम का जयकार करने लगे; उस समय गोरा कुम्हारने भी अपने लूले हाथ अचानक ऊपर किए । तब उस लूले हाथों को भी हाथ आ गए । यह देखकर संतमंडली हर्षित हुई । सर्व लोगोंने पांडुरंग का जयघोष किया ।

गोरा कुम्हार की पत्नीने श्री विठ्ठल से दया की भीख मांगी ।” हे पंढरीनाथ, मेरा बच्चा पति के चरणोंतले रौंदा गया; मैं बच्चे के बिना दुःखी हो गई हूं । हे विठ्ठल, मुझपर दया करो । मुझे मेरा बच्चा दो ।” पंढरीनाथने उसकी विनती सुनी । कीचड में रौंदा गया बच्चा रेंगते-रेंगते सभा से उसके पास आते हुए उसे दिखा । उसने जाकर बच्चे को अपनी गोदी में लिया । संतमंडली के साथ सभीने हर्षित होकर तालियां बजाई ।