मकरसंक्रांति

एक दिन मधुर बोलने से अच्छा है प्रतिदिन मधुर बोलना,
यह बतानेवाला चैतन्यपूर्ण मकरसंक्रांति त्योहार !

१. बुरा बोलने के दुर्गणरूपी राक्षस को नष्ट करने का
निश्‍चय करने का अवसर प्रदान करनेवाला मकरसंक्रांति त्योहार !

मित्रो, आज हम मकरसंक्रांति त्योहार के विषय में समझनेवाले हैं ।

१ अ. मकरसंक्रांति त्योहार की विशेषता : मित्रो, आजतक हमने देखा कि, प्रत्येक त्योहार किसी-न-किसी निश्‍चित तिथिपर आता है । परंतु, मकरसंक्रांति ही ऐसा त्योहार है, जो तिथिवाचक नहीं है । जिस दिन सूर्यमकर राशि में प्रवेश करता है, उस दिन यह त्योहार मनाया जाता है ।

१ आ. दूसरों के मन को चोट लगे, ऐसा बोलना, यह दुर्गुण एक राक्षस ही है और इसे नष्ट करना ही आवश्यक ! : संक्रांति को देवता माना गया है । एक कथा में लिखा है कि इस दिन देवताने संकरासुर नामक राक्षस का वध किया था । इससे हमें सीखना है कि राक्षस बुराई का प्रतीक है । अतः, हम भी अपने मन के बुरे विचारों और दुर्गुणों को नष्ट करने का निश्‍चय करेंगे ! दूसरों को दुःख हो, ऐसा बोलना, एक राक्षस ही है ।इसे भगाने का निश्‍चय इसी दिन हम करेंगे ।

मित्रो, आजकल अनेक बच्चे अपने वचनों से दूसरों को कष्ट देते हैं । उदाहरण के लिए – कुछ लडके अपनी मां से कहते हैं, ‘तुझे कुछ नहीं समझता ।’ ‘तू पागल है ।’ पिता को कहते हैं, ‘आपको क्या समझता है ?’ ‘मैं आपकी कुछ नहीं सुनूंगा ।’

मित्रों को बिल्ली, कुत्ता, गधा, ऐसे अपशब्द कहते हैं । हमारे ऐसे शब्दों से हम दूसरों को निरंतर कष्ट देते हैं । हम इस अपशब्दरूपी दैत्य को नष्ट करने का प्रण करेंगे ।

१ इ. अपनी मधुर वाणी से दूसरों को आनंद मिलना आवश्यक ! : इस दिन हम सब एक-दूसरे को तिलगुड देते हैं और कहते हैं, तिलगुड लीजिए, मीठा-मीठा बोलिए ! इस में मीठा शब्दका अर्थ है – सदैव अच्छा बोलना । किसी का मन दुखे, ऐसा कभी न बोलें । तिल-गुड खाते समय, खानेवाले को आनंद होता है । इसी प्रकार, हम ऐसा बोलें, जिससे दूसरों को आनंद हो । यदि हम ऐसा करेंगे, तो ही हमें अधिकार होगा, तिल-गुड लीजिए और मीठा-मीठा बोलिए, यह कहने का ! अतः मित्रो, आइए हमसब मीठा बोलने का निश्‍चय करेंगे !

१ ई. केवल मकरसंक्रांति के दिन मधुर बोलने की अपेक्षा प्रतिदिन ही मधुर बोलकर दूसरों को आनंद दें ! : मित्रो, क्या आपके प्रतिदिन के बोल से दूसरों को आनंद होता है ? हमें केवल एक दिन ही मीठा बोलना चाहिए अथवा प्रतिदिन दूसरों को आनंद हो, इस प्रकार बोलना चाहिए ? फिर हम ऐसा क्यों बोलते हैं, जिससे दूसरों को कष्ट होता है ? आज हम देखते हैं कि कुछ बच्चे अपने माता-पिता से भी ठीक से नहीं बोलते । बडों को उलटा उत्तर देते हैं । कुछ बच्चे कक्षा में एक-दूसरे को गालियां देते हैं । तब, केवल एक दिन मीठा बोलने का नाटक करने से क्या लाभ ? प्रतिदिन ही मीठा बोलना चाहिए न ?

१ उ. मकरसंक्रांति से यह सोचकर बोलने का निश्‍चय करें कि मैं उस व्यक्ति में बैठे भगवान से बात कर रहा हूं ! : मित्रो, इस वर्ष की मकरसंक्रांतिपर हम सब निश्‍चय करेंगे कि किसी को दुःख हो, ऐसा कभी नहीं बोलेंगे । अपनी मीठी बातों से दूसरों का मन जीतने का प्रयत्न करेंगे ! मीठा बोलते समय ध्यान रखें कि प्रत्येक व्यक्ति में भगवान हैं और मैं उनसे बातें कर रहा हूं । – मित्रो, हमारे सामने भगवानजी आएंगे, तो हम उनसे कैसे बात करेंगे ? इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति में भगवान है और मैं उस भगवान से बोल रहा हूं, इस भाव से बोलना, अर्थात मधुर बोलना । तो फिर मित्रो, आजकी मकरसंक्रांति के दिन ऐसा भाव रखकर बोलने का निश्‍चय करेंगे !

२. अपने वचन से दूसरों को दुःख न देने का निश्‍चय करेंगे !

हम वास्तविक अर्थ में मकरसंक्रांति मनाएंगे ! आज की मकरसंक्रांति से हम दूसरों को कष्ट हो, ऐसा नहीं बोलेंगे और मधुर बोलकर दूसरों को आनंद देने का निश्‍चय करेंगे ।यही वास्तविक मकरसंक्रांति है । मित्रो, अपने शब्दों से दूसरों को दुःख देना पाप है । क्या आप यह पाप करना चाहते हैं ? नहीं न ? तो फिर, आज से अपना आचार-विचार आगे दिए अनुसार रखने का निश्‍चय करेंगे तथा यह बात दूसरों को भी बताएंगे ।

अ. अपने माता-पिता से उद्दण्डता से नहीं, नम्रतासे बोलूंगा ।

आ. मित्रों को गाली नहीं दूंगा ।

इ. शिक्षक, भाई-बहन, घर के बडे लोग तथा पडोसियों से उलटा बात नहीं करूंगा ।

ई. दूसरों के नाम का, किसी की न्यूनता का अथवा दोषों का उपहास नहीं करूंगा ।

उ. किसी को दुख हो, ऐसा विनोद अथवा हंसी नहीं करूंगा ।

३. भगवान की अधिक भक्ति करने का दिन

मकरसंक्रांति की एक विशेषता यह भी है कि इस दिन वातावरण में देवता का चैतन्य अधिक मात्रा में होता है । इसलिए, हम इस दिन कुलदेवता का अधिक नामजप करेंगे । इससे हमें देवता से अधिक शक्ति मिलेगी । अतः मित्रो, आइए, हम अपने दुर्गुणों को नष्ट करने के लिए भगवान से शक्ति मांगेंगे !

४. मकरसंक्रातिपर प्लास्टिक की वस्तुएं नहीं,
धर्मका ज्ञान देनेवाले ग्रंथ अथवा सात्त्विक वस्तुओं का दान करें !

किसी को दान (वान, त्योहारी) करने का अर्थ है, उसमें निवास करनेवाले ईश्‍वर को तन, मन और धन से शरण जाना । दान करते समय मन में विचार करें, हे भगवान, यह शरीर आपका है । मन भी आपका है तथा मेरे पास का धन भी आपका है । मनमें ऐसे विचार आने के लिए दान की जानेवाली वस्तु सात्त्विक होनी चाहिए । मान लीजिए, आपने प्लास्टिक का डिब्बा दान किया है, तो उससे क्या लाभ होगा ? केवल वस्तुएं रखने में सहायता होगी । किंतु मित्रो, यदि हम श्रीरामरक्षास्तोत्र अथवा श्री गणपति, श्री सरस्वतीदेवी इत्यादि देवताओं के लघुग्रंथ दान करेंगे, तो अनेक लोगों को हमारे धर्म का ज्ञान मिलेगा । उनके मन में देवता के प्रति भक्तिभाव बढेगा । ऐसा दान देवता को भी प्रिय लगेगा । अतः मित्रो, हम अपने माता-पिता से देवता को प्रिय वस्तुएं ही दान करने की विनती करेंगे ! ऐसा करेंगे न मित्रो ?

५. चैतन्य देनेवाले तिलका सेवन करने का महत्त्व

मित्रो, इस काल में वातावरण में ठंडी अधिक होती है । अतः, इन दिनों में आयुर्वेद के अनुसार तिल का सेवन लाभदायक होता है । तिल खाने से हम में देवताओं का चैतन्य ग्रहण करने की क्षमता बढती है । इस चैतन्य से हम में अपने दुर्गुणों को नष्ट करने की शक्ति उत्पन्न होती है तथा देवताओं के गुण हम में आते हैं । तिल चैतन्य का प्रतीक है । जब हम दूसरों को तिल देते हैं, तब इसका अर्थ यह होता है कि हम उसे चैतन्य दे रहे हैं । मित्रो, हम इस दिन अपने बोल-चाल से दूसरों को चैतन्य देने का निश्‍चय करेंगे, यही वास्तविक मकरसंक्राति है !

मित्रो, इस मकरसंक्रांतिपर अपने में देवता के गुण लाकर चैतन्य बढाएंगे तथा अपने अच्छे एवं आदर्श वचनों से मकरसंक्राति के दिन ही नहीं, प्रतिदिन भी दूसरों को चैतन्य के रूप में तिल-गुड देंगे !

– श्री. राजेंद्र पावसकर (गुरुजी), पनवेल.