संत जनाबाई

संत जनाबाईने अपने अभंगों में अपना नाम ‘दासी जनी’, ‘नामदेव की दासी‘ तथा ‘जनी नामयाची’ ऐसा लिखा है । वह संत नामदेवजीके घर दासी के रूप में कैसे आई ? इस विषय में जानकारी केवल दस-बारह पंक्तियों में दी जा सकती है; परंतु अपने दास्यत्व का, अपनी शूद्र जाति का इतना ही नहीं तो अपने ‘स्त्रीत्व’का अनुभव व्यक्त करनेवाले अनेक अभंग उनको स्वयं ही सूझे हैं तथा उन्होंने उन्हें अपने शब्दों में व्यक्त भी किया है । विठ्ठलको ही माता-पिता तथा अनेक प्रसंगों में सखा, घनिष्ठ मित्र संबोधित करनेवाली जनी का विठ्ठल से हुआ संवाद उसके अनेक मनभावन अभंगों में दिखाई देता हैं ।

जनाबाई गंगाखेड गांव की रहनेवाली, ‘दमा’ नामक एक शूद्र जाति के भक्त की पुत्री थीं । अपनी जाति का उल्लेख उन्होंने अपने अनेक अभंगों में स्वत:ही किया है । जनाबाई जब पांच वर्ष की थीं, तब उनकी माता का निधन हो गया । दमा को स्वप्न दिखाई दिया तथा उस स्वप्नदृष्टान्त के अनुसार, विठ्ठलभक्त तथा पंढरपुर में निवास करनेवाले, दर्जी जाति के दामाशेट्टी के पास अपनी छोटीसी जनी को छोडकर दमा चला गया । दामाशेट्टी का संपूर्ण परिवार भगवद भक्त था । वह पंढरपुर के केशिराज की पूजा उनके यहां होती थी । उनका पुत्र नामदेव तो इतना विठ्ठलप्रेमी था कि वह विठ्ठल को ही अपना सखा माना करता था ।

ऐसे नामदेव के परिवार में जनाबाई आश्रित होकर रहीं । जनी की माता तो पहले ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं तथा अब तो पिता भी राम-राम करते चले गए । इस अनाथ का परिचय भी जनाबाई के अभंग में पद-पद में व्यक्त हुआ है ।

‘‘आई मेली बाप मेला । मज सांभाळी विठ्ठला ।।
हरि रे मज कोणी नाही । माझी खात (खाजत) असे डोई ।।
विठ्ठल म्हणे रुक्मिणी। माझे जनीला नाही कोणी ।।
हाती घेऊनी तेलफणी। केस विंचरुनी घाली वेणी ।।”

अर्थ : माता मरी बाप मरा । मुझे संभाले विठ्ठल ।।
हरि रे मेरा कोई नहीं । मेरे सिरमें खुजली हो रही है ।।
विठ्ठल बोले रुक्मिणी । मेरी जनीका कोई नहीं ।।
हाथमें ले तेल-फणी (फणी – कंघी) । केशसज्जा कर बनाए चोटी ।।”

ऐसी कल्पना कर जनी विठ्ठल से वार्तालाप करती थीं । सबके सखा परमेश्वर से माया का आधार खोजने की मानसिकता इस अभंग में है ।
जनाबाई आश्रित क्यों न हो, वह दामाशेट्टी के परिवार से एक जो हो गई थी । उनपर जब विठ्ठल का हार चोरी करने का आरोप लगा, तब पंढरपुर के मंदिर के पुजारी भी उन्हें कहते हैं, ‘‘अगे शिंपियाचे जनी । नेले पदक दे आणोनी ?’’
(अरे दर्जी की जनी ! जो हार लेकर गई है वह हार लाकर दे ?)”

नामदेव के घर में रहते हुए उस दासी का संसार कितना होगा ? आंगन, पिछवाडा, पाकशाला, (रसोई घर) अनाज-गोदाम इतनी ही सीमा में वह रहा करती; परंतु शरीर से सीमित संसार में रहते हुए भी जनी मन से असीम परमात्मा की ओर निहारती । उसका स्वरूप जानने का प्रयत्न करती । तुलसीवृंदावन, आंगन, बडा घडा, चक्की, गोबर लेने जाने का चारागाह जैसे स्थलों का उल्लेख इन अभंगों में मिलता है, उन सभी स्थानोंपर प्रभु सदा उसके साथ हैं । वह कोठी में उसके साथ चक्की पीसते हैं, गोबर उठाते हैं, आंगन में सफाई कर रंगोली बनाते हैं । ऐसे घर की सीमा में उसी अनंत, असीम परमेश्वर को वह निहारती । घर ही घर में कष्ट सहकर, दासी बनकर काम करते हुए उन्होंने मन से आध्यात्मिक तथा पारमार्थिक उन्नति की ।
पूर्व जन्म के संचित, दामाशेट्टी के घर का भक्ति का वातावरण तथा नामदेव आदि संतों के आध्यात्मिक संस्कार इन सबके कारण भक्त दासीजनी ‘संत जनाबाई’ बन गई ।
एक अभंगमें वह कहती हैं,

‘‘वामसव्य दोहींकडे । दिसे कृष्णाचे रूपडे ।
वरतीखाली पाहू जरी । चहूकडे दिसे हरी ।
सर्वांठायी पूर्णकळा । जनी दासी पाहे डोळां ।।’’

 

अर्थ : ‘‘वामसव्य दोनों ओर । दिखे कृष्णका स्वरूप ।
ऊपर-नीचे जहां देखूं । चारों ओर दिखे हरि ।
सभी स्थानोंपर पूर्णकला । जनी दासी देखे नेत्रोंसे ।।’’

सर्वओर परमेश्वर दिखे इतने उनके मन:चक्षु विशाल हो गए हैं । परमात्मा की ‘पूर्णकला’को वह जान गई है । अभंग में पूर्णकला शब्द का प्रयोगकर संर्पूण उपनिषदों का तत्त्वज्ञान उन्होंने एक शब्द में ही कह दिया है ।