विद्यार्थी मित्रो, क्या हम सच में स्वतंत्र हैं ?

भारत में रहनेवाले अंग्रेजों के वंशज !

१५ अगस्त १९४७ इस दिन हम (भारत देश) स्वतंत्र हुए; परंतु ‘क्या हम सच में स्वतंत्र हैं’, यह प्रश्न निर्माण होता है । इसका कारण है, आज हमारी प्रत्येक कृती अंग्रेजों की तरह है । अंग्रजों ने हमपर अनेक अत्याचार किए । जालीयनवाला बाग हत्याकांड, उसी प्रकार क्रांतिकारी सावरकरजी को कोल्हू के बैल की तरह बांधकर चाबुक की फटकार दी । स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अनेकों ने अपनी गृहस्थी को दांव पर लगा दिया । अनेक लोग फांसीपर चढे । ऐसा होते हुए भी हमें उसकी चीढ न आकर हम उनके मानसिक गुलाम होकर रहते हैं । प्रगती तथा विज्ञान के नाम पर हमारी संस्कृती, देव, देश तथा राष्ट्रप्रेम इनको हम भूल रहें हैं, इसी तरह का व्यवहार हो रहा है । सच तो यह है कि, हम हमारी कृतीसे ‘हम अंग्रेजों के ही वंशज हैं’, ऐसा दिखाते हैं ।

लोकमान्य तिलक को जो अपेक्षित है वह स्वराज्य

लोकमान्य तिलक ने कहा था, ‘स्वराज्य यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है तथा वह मै प्राप्त करके ही रहुंगा ।’ उन्हें अपेक्षित स्वराज्य याने जिनमें स्वधर्म, स्वराष्ट्र, स्वसंस्कृती, स्वभाषा इन विषयों का तीव्र अभिमान होनेवाले लोगों का राष्ट्र । आज स्वतंत्रता के उपरांत भी हमें उलटा चित्र दिखाई दे रहा है । यह सब देखकर हमें ऐसा लगता है, ‘क्या सच में हम स्वतंत्र है ?’

ऐसा है अंग्रेजों का अनुकरण !

अंग्रेजों की वेशभूषा करना : आज हम स्वतंत्र भारतमें अंग्रेजों की वेशभूषा करके उनके जैसा व्यवहार करते हैं । लडके टाय, शर्ट, पँट, तो लडकियां इंग्लंड की लडकीयों की तरह जीन्स तथा टी शर्ट पहनकर घुमते हैं तथा व्यवहार करते हैं । उस प्रकार का व्यवहार करना हमें शोभनीय तथा गौरवास्पद लगता है । आज बच्चों को यदि पूछा जाय कि, ‘आपके पास कुर्ता तथा पायजामा है ?’ तो वे ‘नहीं’ ऐसा कहते हैं । हमें निश्चय करना चाहिए कि, मैं स्वतंत्र भारतमें रहता हूं (फिरता / व्यवहार) तो मेरा पोशाक/पहनावा कम से कम त्यौहारोंके समय भारतीय रहे, तभी ‘मैं स्वतंत्र भारतमें रहता हुं’, ऐसा हम कह सकते हैं ।

अध्यापकों को ‘सर’ कहना : आज हम यदि स्वतंत्र हैं, तो अध्यापकों कोगुरुजी’ कहना चाहिए । उन्हें ‘हॅलो’ न कहते हुए आदरपूर्वक नम्रता से प्रतिदिन नमस्कार करना चाहिए । ‘सर’ अंग्रजों को कहा जाता था । फिर हम भी उसी प्रकार कहेंगे क्या ?

मातृभाषा में नहीं, अंग्रेजी में शिक्षा लेना गौरवास्पद/अभिमानास्पद लगना : जिन अंग्रेजों नें हमपर १५० वर्ष अत्याचार किए, उनकी भाषा में शिक्षा लेना हमें शोभनीय तथा गौरवास्पद लगता है । इसका अर्थ हम आज भी अंग्रेजों के मानसिक गुलाम ही हैं । हमनें हमारी स्वभाषा का अभिमान जागृत कर मातृभाषा में ही शिक्षा लेनी चाहिए ।

क्रांतीकारीयों की अपेक्षा चित्रपट अभिनेता आदर्श रहना : भगतसिंग, राजगुरु, सुखदेव तथा सावरकर यह हमारे आदर्श होना चाहिए । उन्होंनें उनके सर्वस्व का त्याग किया । क्रांतीकारी ऐन वक्त पर युवावस्था मे फांसीपर चढे, इसका हमें सतत स्मरण रहना चाहिए । उनके त्याग से हमें हमेशा आदर्श लेना चाहिए । चलचित्र के अभिनेता यह हमारे आदर्श नहीं हैं ।

सभी बातों के शोध अंग्रेजोंने लगाने के कारण गौरवास्पद लगना; मात्र प्रत्यक्ष में मूल संशोधक के विषय में जानकारी न लेना : आज हमें यह बताया जाता है, ‘सभी संशोधन (शोध) अंग्रेजों ने लगाये हैं । इसलिए हमें उनके लिए अभिमान निर्माण होता है ।’ सच तो यह है कि, अंग्रेज आने के पूर्व हमारे ऋषिमुनीयों ने सभी शोध लगाये थे ।

१. विमानका शोध – भारद्वाज ऋषी

२. खगोलशास्त्र – आर्यभट्ट

३. रसायनशास्त्र – नागार्जुन

४. वनस्पतीशास्त्र – जीवक

पाश्चात्त्य पद्धती के अनुसार जन्मदिन मनाना : ‘आजकल के बच्चे केक काटकर तथा मोमबत्ती बुझाकर जन्मदिन मनाते हैं । तो क्या हम स्वतंत्र हैं ? आरती उतारकर तिथीनुसार जन्मदिन मनाक रही ‘हम स्वतंत्र हैं’, ऐसा हम कह सकते हैं ।

अंग्रेजों की तरह आहार करना : पाव, बटर, बर्गर, पिझ्झा इनकी अपेक्षा हमारा आहार/भोजन याने दाल, चावल, गेहूं, ज्वार तथा बाजरी आदी की रोटी (भाकरी) यह है । जैसा आहार/भोजन, उसी प्रकार के विचार होते हैं । आहार/भोजन अंग्रेजों के जैसा रहा तो विचार भी उसी प्रकार के रहेंगे ।

माता-पिताको ‘मम्मी तथा पप्पा’ कहना अच्छा लगना : माता-पिता को हमें ‘पप्पा’ तथा ‘मम्मी’ कहना अच्छा लगता है । यह अंग्रेजों के गुलाम होने का प्रतीक है । आजसे हमें ‘माँ-पिताजी’ही कहना चाहिए, तो ही हमने स्वातंत्र्यदिन संपन्न किया, ऐसा होगा ।

अंग्रेजों के दिन मनाने में धन्यता महसूस होना : उदा. ३१ दिसंबर यह हम नया वर्ष मानकर आनंद से मनाते हैं । सच तो यह है कि, हमारा नववर्ष गुढीपाडवा के दिन मनाया जाना चाहिए; परंतु हम नये वर्ष का स्वागत ३१ दिसंबर की मध्यरात्रि को करते हैं, यह गुलामी का लक्षण है । आज हम स्वतंत्र हैं, अत: हम सबको प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि, ‘हम हमारे अपने त्यौहार तथा दिन मनाएंगे; परंतु अंग्रेजों के दिन कभी भी नहीं मनाएंगे ।’

प्रतिज्ञा, राष्ट्रगीत तथा वन्दे मातरम् इनके समय घटित होनेवाली अयोग्य कृतियों के कारण होनेवाला राष्ट्र का अवमान : आजकल के बच्चे प्रतिज्ञा कहते समय चेष्टा करना (चिढाना), अनावश्यक बात करना, लिखाई करना ऐसी कृतीयां करते हैं । ऐसा करना याने हमारी प्रतिज्ञा का अवमान करने जैसा है । पर्याय से वह राष्ट्र का ही अवमान है । हम ‘वन्दे मातरम्’की दो ही कडी (चरण) गाते हैं, यह हमारे राष्ट्रगीत का अवमान है । प्रत्यक्ष में वह छ: (छह) पदोंका है । आजके ही दिन हमनें संपूर्ण ‘वन्दे मातरम्’ गाने का निश्चय करना चाहिए ।

स्वतंत्रता के दिनों मे ध्वज का/राष्ट्रध्वज का अवमान करना : कुछ बच्चे राष्ट्रध्वज का उपयोग खेलने के लिए करते हैं, कुछ सायकल को लगाकर घुमते हैं, कुछ लोग जेब में लगाते हैं । सायंकाल में राष्ट्रध्वज कहीं तो भी गिरा हुआ रहता है । प्लास्टिक के ध्वज की बिक्री करना तथा तिरंगा समान/ तिरंगा रंगके टी-शर्ट पहनना यह सभी हमारे राष्ट्रके प्रतीक का अवमान करने जैसाही है । आज हमनें प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि, ‘मैं राष्ट्रध्वज का अवमान नहीं होने दुंगा ।’

परतंत्रता की स्थिती पलटकर स्वतंत्रता का प्रत्यक्ष अनुभव होने के लिए निश्चय किजीए !

यदि हम स्वतंत्र रहते हैं, फिर भी हम अंग्रेजों की मानसिक गुलामगिरी में ही व्यवहार करते हैं । सारांश यह कि, हम स्वतंत्र न होकर परतंत्रता में ही व्यवहार करते हैं । यह स्थिती बदलने का निश्चय करना, यही वास्तविक स्वतंत्रतादिन मनाने जैसा होगा ।’

– श्री. राजेंद्र पावसकर (गुरुजी), पनवेल