आदर्श मित्रप्रेम !

१. तमिल महाकवी​ कंबन तथा उसके मित्र ओटूक्कूत्तन द्वारा तमिल भाषा में स्वतंत्र रामायण की रचना करना :कंबन तमिलनाडू का महाकवी था । वह प्रतिभावान तथा सूक्ष्मदर्शी विद्वान भी था । ओटूक्कूत्तन नाम का उसका एक मित्र था । वह भी बडा विद्वान था । कंबन तमिल में रामायण की रचना कर रहा है, यह जाननेपर कूत्तन कोभी प्रेरणा हुई तथा उसने भी तमिल में रामायण की रचना करना आरंभ किया । दोनों की रामायण की रचना स्वतंत्ररूप से आरंभ रही, तथा यथासमय पूरी भी हो गई ।

२. कंबन द्वारा रचित रामायण का लोकप्रिय होना : कंबन द्वारा रचित रामायण लोकप्रिय हुई । कंबन अपनी रामायण गाना आरंभ करते तो, श्रोता मग्न हो जाते तथा उसकी प्रशंसा करते । कंबन जहां भी जाता, उसका आदरकिया जाता तथा सम्मान होता । सर्वत्र उसकी ही जयकार थी ।

३. कूत्तन द्वारा रचित रामायण लोकप्रिय न होने से निराश होकर उसने स्वयं रची रामायण जलाकर उसकी राख शरीरपर मलकर गोसाकी बनना निश्‍चित किया : कूत्तन अपनी रामायण गाने बैठता, तो बहुत ही कम श्रोता होते थे । अत: कूत्तन का चहेरा उतर जाता । उसका सारा श्रम व्यर्थ गया, ऐसा उसे लगता था । मैं ऐसी ही उपेक्षित अस्था में जिऊंगा तथा अंत में मर जाऊंगा ! ऐसा सोचते सोचते उसका सिर भन्ना जाता । उसके जीवन में सर्वत्र निराशा का अंधेरा फैल गया । अंत में एक दिन कूत्तन ने स्वयं रचित रामायण जलाकर उस रामायण की राख शरीरपर मलकर गोसाकी बनना निश्‍चित किया ।

४. कूत्तन स्वयं द्वारा रचित रामायण जला रहा था, तभी कंबन वहां पहुंचा तथा मित्र का हाथ पकडकर उसे रोकाऔर उसकी रामायण को जलने से बचा, उत्तरकांड अपने पास रखा : यह बुरा समाचार कंबन के कानोंतक पहुंचा ।वह दौडता हुआ अपने मित्र के पास पहुंचा । उसने देखा, कूत्तन स्वयं रचित रामायण की पोथी जला रहा था ।कंबनने उससे कहा, अरे पगले, यह क्या कर रहे हो ? स्वयं रचित रामायण ऐसे क्यों जला रहे हो ? उसपर कूत्तन ने कहा, तुम्हारे सामने मैं जुगनू हूं । मेरी रामायण को कोई भी नहीं पूछेगा । उसपर धूल जम जाएगी । इससे तो अच्छा है कि उसे जला दूं ! कंबनने कूत्तन का हाथ पकड लिया । कूत्तन की रामायण का उत्तरकांड ही जलना बाकी था । कंबनने वह अपने पास रख लिया ।

५. कंबनने कूत्तन की रामायण के उत्तरकांड से स्वयं के रामायण काव्य की पूर्तता की तथा दोनों ने मिलकर वह पूराकिया, ऐसा सारी दुनिया कह सके, ऐसे मित्रप्रेम का आदर्श दुनिया के सामने रखा : कंबनने कूत्तन से कहा, अरे पगले, तू तो मेरा मित्र है ना ! यह जलाने से पूर्व मुझे बता तो देते ! अब जो मैं बोलता हूं, वह सुन । तुम्हारी रामायण लिखकर पूरी हो गई है । मेरी रामायण के उत्तरकांड की रचना अभी बाकी है । उसकी रचना मैं अब नहीं करूंगा । मेरी रामायण में तुम्हारा यह उत्तरकांड जोड दूंगा, इससे रामायण पूर्ण हो जाएगी । लोग तुम्हें तथा मुझे रामायण रचियता के नामसे जानेंगे ! मित्रप्रेम का यह एक आदर्श होगा !!

(संदर्भ : साप्ताहिक जय हनुमान (ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी, कलियुग कर्ष ५११५ (६.७.२०१३))