सत्यकाम जाबाल

प्राचीनकाल में उत्तरी हिन्दुस्थान में जाबाला नाम की एक निर्धन दासी रहती थी । उसका सत्यकाम नाम का एक पुत्र था । जाबाला दिनभर कडा परिश्रम कर अपना तथा अपने प्रिय पुत्र का पेट भरती थी । जबाला गरीब होते हुए भी बहुत प्रामाणिक थी । उसने अपने पुत्र को भी सदा सत्य बोलना सिखाया था । उसने उसका नाम भी सत्यकाम (सत्य में रूचि रखनेवाला) रखा था । सत्यकाम के अतिरिक्त जबाला का कोई नहीं था । सत्यकाम को देखकर वह सबकुछ एक क्षण के लिए भूल जाती थी । उस समय पुत्र को शिक्षा प्राप्त कराने हेतु उसे दूर वन में किसी ऋषि के पास भेजती थी । बालक को आठ वर्ष की अवस्था से बीस वर्ष की अवस्थातक गुरु के पास रहना पडता था । वहांपर वह प्रत्येक कार्य में प्रवीण बनता था ।

सत्यकाम आठ वर्ष का होते ही अपनी मां से बोला, `मां, अब मैं शिक्षा ग्रहण करने वन जा रहा हूं ।’ सत्यकाम में शिक्षा प्राप्त करने की बहुत उमंग थी । जबाला सोच में पड गई । छोटा-सा सत्यकाम इतना दूर कैसे रह पाएगा ! उसकी आंखों के समक्ष घना वन दिखाई देने लगा तथा सत्यकाम के बिना सूना-सूना लगनेवाला उसका घर भी दिखाई देने लगा ।

एक अन्य कल्पना मन में आते ही उसके नेत्रों में अश्रु आ गए । वह एक दासी थी । वह ऊंची जाति अथवा कुल की नहीं थी । उस काल में उच्च कुल के बालक ही गुरु के पास शिक्षा ग्रहण करने जाते थे । उसे तो सत्यकाम के पिता का नाम भी ज्ञात नहीं था । ऐसे बालक को कौन गुरु अपने निकट रखेंगे !

सत्यकामने पूछा, `मां, मैं गुरुजी के पास जा रहा हूं, तो वे मेरे गोत्र के विषय में पूछेंगे न ? तब, मैं उन्हें क्या बताऊंगा ?’

जबला रोते हुए कहती है, `बेटा सत्यकाम, मैं युवा थी तब अनेक घरों में दासी के रूप में काम करती थी । उसी समय तुम्हारा जन्म हुआ । तुम दासीपुत्र हो । तुम्हारे पिता का नाम भी मुझे ज्ञात नहीं है । मेरा नाम जबाला है, इसलिए तुम अपने गुरु से अपना नाम, सत्यकाम जाबाल, इतना ही बताना ।’

सत्यकाम गुरु की खोज में वह वन-वन घूमता हुआ गौतम ऋषि के आश्रम में पहुंचा । उस समय गौतम ऋषि के पास अनेक राजपुत्र एवं ब्राह्मणकुमार शिक्षा लेने आए थे । सत्यकाम ने घबराते-सकुचाते आश्रम में प्रवेश किया । उस समय स्नान कर भस्म लगाए हुए एवं पीठपर लम्बे, खुले केश छोडकर बैठे अनेक तेजस्वी कुमार वेदपाठ कर रहे थे । गौतम ऋषि ध्यानमग्न बैठे थे । सत्यकाम डरते-डरते आगे बढा ।

एक दरिद्र लडका आश्रम में घुसकर सीधे गुरुजी के निकट जा रहा है, यह देखकर शिष्यों में कुलबुलाहट होने लगी । `अरे, वह देखो एक शुद्र लडका आश्रम में पढने आया है !’ ऐसे उपहासभरे शब्द भी सत्यकाम के कानों में पडे । इतने में गौतम ऋषि ने अपने नेत्र खोलकर सब ओर शान्ति ने दृष्टि घुमाई । एक क्षण में पूरे आश्रम में शान्ति छा गई ।

गौतम ऋषि कोमल स्वर में बोले, `बालक, तुम्हें क्या चाहिए ?’ सत्यकाम नीचे देखते हुए धीमें स्वर में बोला, `भगवन्, मुझे आपसे शिक्षा लेना है ।’

गौतम ऋषि सराहते हुए बोले, ‘बालक, तुम्हारी सोच अच्छी है, परन्तु तुम्हारा गोत्र क्या है ?’ सत्यकाम शीश झुकाकर बोला, `भगवन्, मेरा नाम सत्यकाम और माता का नाम जबाला है । इसलिए, मैं सत्यकाम जाबाल हूं । इससे अधिक मुझे कुछ ज्ञात नहीं है ।’

यह सुनकर शिष्यों के मुखपर उपहास का भाव उभर आया । गौतम ऋषि ने एक बार पुन: सब ओर दृष्टि घुमाई ।

गौतम ऋषि ने कहा, `बालक सत्यकाम, तुमने सत्य कहा; इतना पर्याप्त है । यद्यपि तुम अपने को दासीपुत्र कहते हो, तो भी मेरे विचार से तुम्हें ब्राह्मणपुत्र होना चाहिए । जो सत्य कहता है, उसे मैं ब्राह्मण मानता हूं ।’

तदुपरान्त गौतम ऋषि ने सत्यकाम का उपनयन संस्कार किया । उसकी शिक्षा आरम्भ करने से पूर्व (अपनी पध्दति के अनुसार) परीक्षा लेने हेतु उन्होंने उसे चार सौ गायें सौंपकर उन्हें चराने के लिए वन जाने को कहा । ऐसे काम से शिष्य की बुदि्ध का पता चलता था । वे गायें पूर्णतः दुर्बल थीं । शिष्योंने उनकी अच्छी देखभाल नहीं की होगी । उनका सारा ध्यान वेद रटने में लगा रहता होगा । सत्यकाम ने कहा, इन गायों की संख्या चार सौसे सहस्र होनेपर आश्रम लौटूंगा ।’

सत्यकाम वन में अनेक वर्ष रहा । वह गायों की मन से सेवा करता । एक दिन उसके समक्ष उसके झुण्ड का एक बैल आया । उसके शरीर में वायुदेव (हवा) ने प्रवेश किया, जिससे वह पूंछ उठाकर सींग से भूमि खोदते हुए उछल-कूद करने लगा ।

वह बैल मनुष्यवाणी में बोला, `सत्यकाम !’

सत्यकाम ने यह चमत्कार देखकर विनयपूर्वक कहा, `कहिए भगवन् !’

बैल बोला, `हमारी संख्या अब सहस्र हो गई है; अब हमें आचार्यजी के पास ले जाओ । उससे पूर्व मैं तुम्हें थोडा ज्ञान देता हूं । तुम्हारी सेवा से मैं सन्तुष्ट हुआ ।’

बैल के रूप में प्रत्यक्ष वायुदेव ही बोल रहे थे । उन्होंने सत्यकाम को ईश्वरीय ज्ञान के एक चौथा भाग का उपदेश किया । वे बोले, `सत्यकाम, प्रकाशमान ये चारों दिशाएं ईश्वर की ही अंश हैं । अब तुम्हें आगे का ज्ञान अगि्नदेवता देंगे ।’ वायु सर्व दिशाओं में घूमती है इसलिए, उसे यह ज्ञान है ।

वायुदेवता की आज्ञानुसार अगले दिन सत्यकाम गायें लेकर आश्रम की ओर निकला । मार्ग में सायंकाल हुई तब उसने गायों को बांधा, अगि्न प्रज्वलित की एवं उसमें समिधा डालने लगा । अगि्न प्रसन्न हुई एवं बोली, `सत्यकाम, मैं तुम्हें ईश्वरीय ज्ञान का चौथा भाग बताती हूं ।’

सत्यकाम ने नम्रतासे कहा, `कहिए भगवन्’

अगि्नने कहा, `समुद्र, पृथ्वी, वायु और आकाश ईश्वर के अंश हैं । हन्स तुम्हें और/अधिक ज्ञान देगा ।’ ‘अगि्न’, समुद्र एवं पृथ्वीपर घूमती है । आकाश में भी सूर्य के रूप में रहती है; इसलिए उसे यह ज्ञान ज्ञात था ।

अगले दिन सायंकाल सत्यकाम ने गायों को बांधा, अगि्न प्रज्वलित की एवं उसमें समिधा डालने लगा । इतने में वहां एक हन्स उडता हुआ आया एवं बोला, `सत्यकाम, मैं तुम्हें ईश्वरीय ज्ञान का चौथा भाग बताता हूं ।’ सत्यकाम बोला, `कहिए भगवन् !’

उसने कहा, `अगि्न, सूर्य, चन्द्र एवं बिजली ये सब ईश्वर के अंश हैं । बाकी ज्ञान तुम्हें पनडुब्बा पक्षी बताएगा ।’ हंस के रूप में तो प्रत्यक्ष सूर्य ही बोल रहे थे । सूर्य तो जैसे आकाश में उडनेवाला एक सोने का हंस ही है ।

दूसरे दिन सायंकाल के समय सत्यकाम ने गायों को बांधा, अगि्न प्रज्वलित की एवं वह उसमें समिधा डालने लगा । इतने में वहां एक पनडुब्बा पक्षी उडते हुए आया एवं बोला, `सत्यकाम, मैं तुम्हें ईश्वरीय ज्ञान का चौथा भाग बताता हूं ।’ प्राणदेवता ने ही इस पक्षी का रूप लिया था । सत्यकाम बोला, `आगे कहिए भगवन् !’

पनडुब्बा पक्षी बोला, `प्राण, आंखें, कान एवं मन ईश्वर के ही अंश हैं । प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का अंश होता है ।

इस प्रकार, सत्यकाम पूर्ण ज्ञानी होकर आश्रम पहुंचा । उसे दूर से देखकर ही गौतम ऋषि सबकुछ समझ गए ।

गौतम ऋषि बोले, `सत्यकाम ! ईश्वर का ज्ञान प्राप्त कर तुम तेजस्वी दिखाई दे रहे हो । तुम्हें यह ज्ञान किसने दिया ?’ सत्यकाम के मुखपर ज्ञान का अपूर्व तेज झलक रहा था ।

सत्यकाम विनयपूर्वक बोला, `मनुष्य की अपेक्षा अन्य प्राणियोंने ही मुझे ज्ञान दिया । परन्तु भगवन्, आपके मुख से वह ज्ञान पुनः सुनने की मेरी इच्छा है । मैंने सूना है कि गुरुमुख के अतिरिक्त अन्य स्थान से प्राप्त सर्व विद्या व्यर्थ है ।’

सत्यकाम को, सर्व चराचर सृष्टि में भरे ईश्वर का ज्ञान गौतम ऋषि ने अपनी रसयुक्त वाणी में पुनः समझाया । अन्य सर्व शिष्योंने लज्जा से शीश झुका दिए । इतने वर्ष वेद रटकर भी उन्हें इतना ज्ञान नहीं हुआ था । आगे चलकर यही सत्यकाम बहुत प्रसिद्ध ऋषि हुए एवं उनसे शिक्षा ग्रहणकर कई शिष्य ज्ञानी बने ।

(छांदोग्यउपनिषदकी सुप्रसिध्द कथापर आधारित)