Navratri (Hindi article)

नवरात्रोत्सव




सारणी -


१. नवरात्रोत्सवमें देवीकी उपासना शास्त्रानुसार कर, कृपाके पात्र बनें !

आश्विन शुक्ल प्रतिपदासे नवरात्रोत्सव आरंभ होता है । नवरात्रोत्सवमें घटस्थापना करते हैं । अखंड दीपके माध्यमसे नौ दिन श्री दुर्गादेवीकी पूजा करना अर्थात् नवरात्रोत्सव मनाना । नवरात्रिके कालमें श्री दुर्गादेवीका तत्त्व अधिक कार्यरत होता है । शास्त्र समझकर देवीकी उपासना करनेसे हमें दुर्गातत्त्वका अधिकाधिक लाभ होता है । इसी दृष्टिसे भक्तगण इस लेखका अभ्यास करें ।

२. श्री दुर्गादेवीकी विशेषताएं

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

सर्व मंगलकारी वस्तुओं में विद्यमान मांगल्य रूप देवी, कल्याणदायिनी, सर्व पुरुषार्थों को साध्य कराने वाली, शरणागतों की रक्षा करने वाली देवी, त्रिनयना, गौरी, नारायणी ! आपको मेरा प्रणाम । श्री दुर्गादेवीके अतुलनीय गुणोंका परिचय इस श्लोकसे होता है । जीवनको परिपूर्ण बनाने हेतु आवश्यक सर्व विषयोंका साक्षात् प्रतीक हैं, आदिशक्ति श्री दुर्गादेवी । श्री दुर्गादेवीको जगत जननी कहा गया है । जगत्जननी अर्थात् सबकी माता ।

३. नवरात्रिमें देवीके कौनसे रूपोंकी उपासना करें ?

महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती, देवीके तीन प्रमुख रूप हैं । एक मतानुसार नवरात्रिके पहले तीन दिन तमोगुण कम करने हेतु महाकाली की, अगले तीन दिन रजोगुण बढाने हेतु महालक्ष्मी की व अंतिम तीन दिन साधना तीव्र होने हेतु सत्त्वगुणी महासरस्वती की पूजा करते हैं ।

४. व्रत करनेकी पद्धति

अनेक परिवारोंमें यह व्रत कुलाचारके स्वरूपमें किया जाता है । आश्विनकी शुक्ल प्रतिपदासे इस व्रतका प्रारंभ होता है ।

  • घरके किसी पवित्र स्थानपर एक वेदी तैयार कर, उसपर सिंहारूढ अष्टभुजा देवीकी और नवार्णव यंत्रकी स्थापना की जाती है । यंत्रके समीप घटस्थापना कर, कलश व देवीका यथाविधि पूजन किया  जाता है ।

  • नवरात्रि महोत्सवमें कुलाचारानुसार घटस्थापना व मालाबंधन करें । खेतकी मिट्टी लाकर दो पोर चौडा चौकोर स्थान बनाकर, उसमें पांच या सात प्रकारके धान बोएं । इसमें (पांच अथवा) सप्तधान्य रखें । जौ, गेहूं, तिल, मूंग, चेना, सांवां, चने सप्तधान्य हैं ।

  • जल, गंध (चंदनका लेप), पुष्प, दूब, अक्षत, सुपारी, पंचपल्लव, पंचरत्न व स्वर्णमुद्रा या सिक्के इत्यादि वस्तुएं मिट्टी या तांबेके कलशमें रखें ।

  • सप्तधान व कलश (वरुण) स्थापनाके वैदिक मंत्र यदि न आते हों, तो पुराणोक्त मंत्रका उच्चारण किया जा सकता है । यदि यह भी संभव न हो, तो उन वस्तुओंका नाम लेते हुए `समर्पयामि’ बोलते हुए नाममंत्रका विनियोग करें । माला इस प्रकार बांधें, कि वह कलशके भीतर पहुंचे ।

  • प्रतिदिन कुंवारी कन्याकी पूजा कर उसे भोजन करवाएं ।

  • `नवरात्रोंका व्रत करनेवाले अपनी आर्थिक क्षमता व सामर्थ्यके अनुसार विविध कार्यक्रम करते हैं, जैसे अखंड दीपप्रज्वलन, उस देवताका माहात्म्यपठन (चंडीपाठ), सप्तशतीपाठ, देवीभागवत, ब्रह्मांडपुराणके ललितोपाख्यानका श्रवण, ललितापूजन, सरस्वतीपूजन, उपवास, जागरण इत्यादि ।

  • यद्यपि भक्तका उपवास हो, फिर भी देवताको हमेशाकी तरह अन्नका नैवेद्य दिखाना पडता है ।

  • व्रतके दौरान उपासक उत्कृष्ट आचरणका एक अंग मानकर दाढी न बनाना, ब्रह्मचर्यका पालन, पलंग व बिस्तरपर न सोना, गांवकी सीमा न लांघना, चप्पल व जूतोंका प्रयोग न करना इत्यादिका पालन करता है ।

  • नवरात्रिकी संख्यापर जोर देकर कुछ लोग अंतिम दिन भी नवरात्रि रखते हैं; परंतु शास्त्रानुसार अंतिम दिन नवरात्रि समापन आवश्यक है । इस दिन समाराधना (भोजनप्रसाद) उपरांत, समय हो तो उसी दिन सर्व देवताओंका अभिषेक व षोडशोपचार पूजा करें । समय न हो, तो अगले दिन सर्व देवताओंका पूजाभिषेक करें ।

  • देवीकी मूर्तिका विसर्जन करते समय बोए हुए धानके पौधे देवीको समर्पित किए जाते हैं । उन पौधोंको `शाकंभरीदेवी’ का स्वरूप मानकर स्त्रियां अपने सिरपर धारण कर चलती हैं और फिर उसे विसर्जित करती हैं ।

  • स्थापना व समापनके समय देवोंका `उद्वार्जन (सुगंधी द्रव्योंसे स्वच्छ करना, उबटन लगाना)’ करें । उद्वार्जन हेतु सदैवकी भांति नींबू, भस्म इत्यादिका प्रयोग करें । रंगोली, बर्तन मांजनेके चूर्णका प्रयोग न करें ।

५. नवरात्रोत्सवके कालमें श्री दुर्गादेवीका नामजप करना

नामजप कलियुगकी सर्वश्रेष्ठ तथा सरल साधना है । नामजपद्वारा देवीको निरंतर पुकारनेसे वे तुरंत हमारी सुनती हैं । नवरात्रिमें अधिक मात्रामें कार्यरत श्री दुर्गादेवीका तत्त्व ग्रहण हो,  इसलिए इस कालमें `ॐ श्री दुर्गादेव्यै नम: ।’ नामजप अधिकाधिक करें ।

६. नवरात्रिमें देवीको की जानेवाली प्रार्थना

नवरात्रिमें हम अपनी विविध कामनाओंकी पूर्तिके लिए देवीसे प्रार्थना करते हैं; परंतु वर्तमान कलियुगमें महिषासुरमर्दिनीसे कौनसी प्रार्थना करना उपयुक्त है?  देवीने महिषासुरका वध किया । आज अधिकांश लोगोंके हृदयमें षड्रिपूरूपी महिषासुर बसते हैं । आसुरी बंधनोंसे मुक्त होनेके लिए नवरात्रिमें आदिशक्तिकी शरण जाकर उनसे प्रार्थना करें, – `हे देवी, आप हमें बल दें । आपकी शक्तिसे हम आसुरी वृत्तिका नाश कर पाएं ।

७. नवरात्रिकी नौ रातें प्रतिदिन गरबा खेलना

`गरबा खेलने’ को ही हिंदू धर्ममें तालियोंके लयबद्ध स्वरमें देवीका भक्तिरसपूर्ण गुणगानात्मक भजन कहते हैं । गरबा खेलना, अर्थात् तालियोंकी नादात्मक सगुण उपासनासे श्री दुर्गादेवीको ध्यानसे जागृत कर, उन्हें ब्रह्मांडके लिए कार्य करने हेतु मारक रूप धारण करनेका आवाहन ।

८. गरबा दो तालियोंसे खेलना चाहिए या तीन तालियोंसे ?

नवरात्रिमें श्री दुर्गादेवीका मारक तत्त्व उत्तरोत्तर जागृत होता है । ईश्वरकी तीन प्रमुख कलाएं हैं – ब्रह्मा, विष्णु व महेश । इन तीनों कलाओंके स्तरपर देवीका मारक रूप जागृत होने हेतु, तीन बार तालियां बजाकर ब्रह्मांडांतर्गत देवीकी शक्तिरूपी संकल्पशक्ति कार्यरत की जाती है । इसलिए तीन तालियोंकी लयबद्ध हलचलसे देवीका गुणगान करना अधिक इष्ट व फलदायी होता है ।

९. नवरात्रिमें सरस्वतीपूजन (अष्टमी व नवमी)

विजयादशमीसे एक दिन पूर्व तथा विजयादशमीपर भी सरस्वतीपूजन प्रधानतासे करें । सरस्वतीका प्रत्यक्ष आवाहनकाल आश्विन शुक्ल अष्टमीपर मनाया जाता है; नवमीपर देवीके मूर्तस्वरूपकी ओर उपासकका आकर्षण बढता है । विजयादशमीपर सरस्वती विसर्जनकी विधि संपन्न की जाती है । अष्टमीसे विजयादशमीतक, शक्तिरूप सुशोभित होता है । सरस्वतीकी तरंगोंसे उपासककी आत्मशक्ति जागृत होती है और उसे आनंदकी अनुभूति होती है ।


अधिक जानकारी हेतु अवश्य पढे सनातनका ग्रंथ – देवीपूजनसे संबंधित कृतियोंका शास्त्र व शक्ति

सनातन संस्था विश्वभरमें धर्मजागृति व धर्मप्रसारका कार्य करती है । इसीके अंतर्गत इस लेखमें `दुर्गादेवीकी विशेषता, नवरात्री व्रत मनानेकी पद्धति, नवरात्रिमें श्री दुर्गादेवीका नामजप व प्रार्थना’ इस विषयपर अंशमात्र जानकारी प्रस्तुत की गई है । अधिक जानकारीके लिए संपर्क करें : sanatan@sanatan.org

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