पंढरपुरमें पांडुरंगकी मूर्तिकी स्थापना

पांडुरंगके चरण समचरण होनेके कारण उनमें द्वैत नहीं है
दिखे सगुण स्वरूप सुंदर । खडा होकर व्याप्त किया चराचर ।।
समचरण दृष्टि इंटपर सजीली । वहीं मेरी हरि वृत्ति रहे ।।
ब्रह्म सर्वगत सदा सम । जहां अनु नहीं विषम ।।

संत कहते हैं,

`‘हे पांडुरंग, आपके चरण समचरण हैं । उनमें द्वैत नहीं है । ऐसे स्वरूपमें आप इन दोइंटोंपर (द्वैतपर) अद्वैत स्वरूपमें खडे हैं ।’’`कर्नाटक, विजयनगरके राजा पांडुरंगकी प्रतिमा अपने साम्राज्यमें ले आए एवं उनकीस्थापना तुंगभद्रा नदीके तटपर की । एकनाथ महाराजके दादा (भानुदास) भगवानविठ्ठलके भक्त थे । उनकी साधना अच्छी थी । भगवान विठ्ठल उनपर प्रसन्न हो गएऔर कहा, ‘‘मैं कर्नाटकमें हूं । तुम मेरी पंढरपुरमें स्थापना करो ।’’ उसके अनुसारभानुदासने विजयनगरके राजाके पास जाकर मूर्तिकी मांग की । राजाको भी स्वप्न हुआ। एकनाथ महाराजके दादा(भानुदास)का विठ्ठलप्रेम देखकर राजाने उन्हें वह मूर्ति दे दी। उन्होंने वह मूर्ति पंढरपुरमें लाकर प्रतिष्ठित की ।’