प्रबलगढ

प्रबलगढ नाम के अनुरूप ही है । यह दुर्ग सहज ही मुंबई-पुणे महामार्ग से जाते समय हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेता है । पूर्व में उल्हास नदी, पश्चिम में गढी नदी, दक्षिण में पाताल गंगा नदी, माणिकगढ एवं नैऋत्य को कर्नाळा और निकट ही इर्शाळगढ से चारों-ओरसे घिरा दुर्ग मुरंजन अर्थात प्रबलगढ ।

इतिहास

उत्तर कोंकण का यह किला पनवेल, कल्याण प्राचीन बंदरगाहोंपर दृष्टि रखने हेतु बनाया गया होगा । दुर्ग की गुहाओं के अध्ययन से इनका कालखंड बौद्ध काल से जोडा जा सकता है । उनपर बनी मनुष्य निर्मित गुहाओं के कारण उत्तरकाल में शिलाहार, यादव राज्यकर्ताओंने वहां लश्करी चौकी स्थापित कर इसे मुरंजन नाम दिया । बहामनी काल में इस दुर्ग का निर्माण हुआ होगा । इसके उपरांत यह अहमदनगर की निजामशाही के अधिकार में आ गया । निजामशाही के अंतिम समय में शहाजी राजाने निजामशाही के उत्तराधिकारी को आश्रय देकर निजामशाही बचाने का प्रयत्न किया; परंतु मुगल शाहजहां एवं बीजापुर के आदिलशाहने संधिकर अपनी संयुक्त सेना शहाजी राजा के पीछे भेजी । तब शहाजी राजा भागकर कोंढाणा एवं मुरंबदेवता के पर्वत की ओर चले गए । इसके उपरांत कोकण में जंजिरा के सिद्दि के पास गए । उनके आश्रय देने से ना कहनेपर चौल में पुर्तगालियों के पास गए ।उनके भी मना कर देनेपर शहाजी राजा जिजाऊ, बालशिवाजी एवं सैन्य के साथ मुरंजन चले गए ।

सन १६३६ में बालशिवाजीने मुरंजन की दहलीज पार की । १६३६ में माहुली की संधि हुई । उसमें उत्तर कोंकण मुगलों के अधिकार में होने के कारण मुरंजनपर मुगलों का शासन प्रारंभ हुआ; परंतु वास्तव में वहां बीजापुर के आदिलशाह की ही सत्ता थी । फिर इस अवसर का लाभ शिवाजी राजाने लिया । जब शिवाजी राजाने जावळी के चंद्रराव मोरे को पराजित कर जावळीपर अधिकार बना लिया, उस समय १६५६ में शिवाजी राजा के शूरवीर सरदार आबाजी महादेव ने कल्याण भिवंडी से लेकर चेऊल और रायरी तक पूरा प्रदेश अपने राज्य में ले लिया । तब मुरंजन शिवाजी महाराज के अधिकार में आ गया । दुर्ग का नाम बदलकर प्रबलगढ रखा गया । फिर १६६५ में पुरंदर की संधि के अनुसार मुगलों को दिए गए २३ गढों में एक प्रबलगढ भी था । जयसिंहने दुर्गपर राजपूत केशरसिंह हाडा नामक दुर्गपाल को नियुक्त किया । तत्पश्चात पुरंदर की संधि का उल्लंघन हुआ । मराठे जब दुर्ग वापस लेने के लिए युद्ध कर रहे थे, तब उनसे युद्ध करते हुए केशरसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ । उससे पूर्व राजपूत स्त्रियोंने जौहर किया । केशरसिंह की मां एवं दो बच्चे दुर्ग में खोजनेपर मिले । शिवाजी राजा के आदेशानुसार उन्हें आदर सहित देऊलगांव में मुगल छावनी में भेज दिया गया । इसके उपरांत दुर्ग में खुदाई करनेपर अत्यधिक संपत्ति प्राप्त हुई ।

गढ के दर्शनीय स्थल

प्रबलगढ का शीर्ष एक बडा पठार है ।संपूर्ण पठारी भाग वन से आच्छादित है । गढपर गणेशमंदिर है । साथ ही दो-तीन पानी की टंकियां भी हैं । इन टंकियों को खोजने एवं गढपर पर्यटन हेतु मार्गदर्शक की आवश्यकता पडती है । प्रथम अंग्रेजोंने प्रबलगढ को माथेरान के समान ठंडे वातावरण के रूप में विकसित करने का विचार किया था; परंतु जल के अभाव के कारण यह विचार छोड दिया गया । गढपर तीन-चार वास्तुओं के ही अवशेष हैं । घने कारवी वनके कारण गढ के मार्ग ठीक से दिखाई नहीं देते । केवल गढ से माथेरान के विविध स्थान बहुत सुंदर दिखते हैं ।

गढपर जाने के मार्ग

शेडुंग मार्ग से : मुंबई एवं पुणे से आते समय प्रथम पनवेल आए । पनवेल पुणे महामार्ग से शेडुंग गांव जाने हेतु मार्ग है । एस.टी. चालक से कहकर शेडुंग मार्गपर उतरा जा सकता है । महामार्ग से जानेवाले मार्गपर चलकर आधे घंटे में शेडुंग गांव पहुंच सकते हैं । शेडुंग गांव से ठाकुरवाडी तक पैदल जाए । ५ कि.मी.के उपरांत ठाकुरवाडी गढ के प्रांरभ के गांव घूमकर बैलगाडीसे यह मार्ग आपको सीधे प्रबलमाची की ओर ले जाएगा । प्रबलमाची तक जाने में डेढ घंटे का समय लगता है । प्रबलमाची गांव के सामने ही एक छोटी मनुष्य के रहने योग्य गुफा दिखती है । इस गुर्फा से गढ जाने हेतु एक घंटा पर्याप्त है । ठाकुरवाडी तक जाने हेतु पनवेल से बस भी है ।

पोइंज मार्ग से : पनवेल चौक मार्ग से शेडुंग से आगे पोइंज मार्ग है । वहां उतरकर पोइंज गांव पहुंचे । सामने की पहाडी से प्रबलमाची गांव जाकर डेढ-दो घंटे में प्रबलगढ पहुंच सकते हैं ।

माथेरान से प्रबळगढ : माथेरान के पास शार्लट जलाशय के पास श्री पिसरनाथ मंदिर से बार्इं ओर मुडनेपर दस मिनट में एक मनुष्य के रहने योग्य गुफा आती है । लोहे की सीढी की सहायता से दो घंटे में आकसर वाडी में पहुंचते हैं । आकसर वाडी से प्रबलगढ पर्वत चढते हुए बुर्ज के नीचे पठार की मनुष्य के रहने योग्य गुर्फा से ऊपर चढते हुए गढ के शीर्ष तक पहुंच सकते हैं ।

रहने की व्यवस्था : गढपर रहने की व्यवस्था नहीं है । शेडुंग गांव की पाठशाला में २५-३० लोगों के सोने की व्यवस्था हो सकती है ।

खाने की व्यवस्था :
स्वयं ही करें ।

पानी की व्यवस्था : बारह महीने पीने के पानी की टंकियां उपलब्ध हैं ।

जाने हेतु आवश्यक समय : ३ से ४ घंटे सतह से ।