विदेशी प्रतिष्ठानों के ‘कैडबरी’ जैसे पदार्थ और कृत्रिम शीतपेय ग्रहण न करना ही देशसेवा है !

१. मलेशिया में ‘कैडबरी’ नामक प्रतिष्ठान की चॉकलेट में सुआर के अवशेषों का उपयोग किया जाना सिद्ध होने के कारण मलेशिया के मुसलमान संगठनोंने उस प्रतिष्ठान के उत्पादोंपर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की है । हिन्दुओं को, गोमाता परम् पूजनीय है । भारत में भी कैडबरी जैसी विदेशी कम्पनियां चॉकलेट तथा अन्य खाद्यपदार्थ बनाती है । तब उसे बनाते समय गोमाता के शरीर के अवशेषों का उपयोग नहीं किया जाता होगा, इसका क्या प्रमाण है ? ऐसे खाद्यपदार्थ खाकर धर्मद्रोह और पाप क्यों करें ?

२. ‘कैडबरी’जैसे चॉकलेट दूध फाडकर बनाए जाते हैं । इसलिए वे पचने में भारी होते हैं तथा वे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं ।

३. विदेशी प्रतिष्ठानोंद्वारा निर्मित कृत्रिम शीतपेयों में (अर्थात सॉफ्ट ड्रिंक्स में) रसायनयुक्त घटक होते हैं । सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि उसमें कार्बन-डाई-ऑक्साईड होती है । वास्तव में कार्बन-डाई-ऑक्साईड शरीर के बाहेर फेंकना चाहिए परन्तु कृत्रिम शीतपेय पीकर हम उसे शरीर के भीतर लेने का विपरीत काम करते हैं ! ये विदेशी प्रतिष्ठान भारत के ही जल का उपयोग कर कृत्रिम शीतपेय बनाते हैं । आज भारत के सहस्त्रो गांवो में पीने के लिए जल उपलब्ध नहीं है और जहां है, वहां भी उसे बहुत दूर से लाना पडता है । ऐसी स्थिति में केवल अपने सुख के लिए भारत के करोडो लीटर जल का व्यर्थ व्यय कर बनाए गए शीतपेय पीना, क्या यह राष्ट्रीय अपराध नहीं है ?

४. आज विदेशी प्रतिष्ठानोंने भारतीय बाजार हस्तगत कर लिए हैं । बडी मात्रा में व्यापारक्षेत्र हस्तगत करने के कारण भारत के करोडो रुपये प्रतिदिन इन विदेशी कंपनियों के माध्यम से विदेश में जा रहे हैं ! इसके कारण वे देश सधन होते जा रहे हैं और भारत निर्धन हो रहा है ! फिर ऐसे विदेशी प्रतिष्ठानों का ग्राहक बनना क्या राष्ट्रीय पाप नहीं है ?

५. विदेशी कम्पनियों के चॉकलेट और अन्य खाद्यपदार्थों की अपेक्षा मुनक्का, मुंगफली की चिक्की जैसे पदार्थ भारतीय जनता के लिए विकल्प बन सकते हैं । भारतीय जनता विदेशी कम्पनियों के कृत्रिम शीतपेय की अपेक्षा गन्ने का रस, नीबू की शिकंजी,, नारियल का पानी आदि पेयों का उपयोग कर सकती है । ये भारतीय पेय सस्ते तो हैं ही, अपितु स्वास्थ्य के लिए भी पोषक हैं !

भारतियों, विदेशी प्रतिष्ठानों के खाद्यपदार्थ, पेय और अन्य वस्तुओं का क्रय कर राष्ट्र का पैसा विदेशी प्रतिष्ठानोंको देने की अपेक्षा उसे स्वराष्ट्र और स्वधर्म के कार्य के लिए उपयोग में लाकर देशसेवा और धर्मसेवा करें ! हिन्दु राष्ट्र की स्थापना के मार्गपर यह हमारा एक महत्त्वपूर्ण पग है !

– (पू.) श्री. संदीप आलशी (३१.५.२०१४)

सन्दर्भ : दैनिक सनातन प्रभात