Diwali (Deepawali) (Hindi Article)

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सारणी -


१. दीवाली (दीपावली)

चौदह वर्षका वनवास समाप्त कर जब श्रीरामप्रभु अयोध्या लौटे, तब प्रजाने दीपोत्सव मनाया । तबसे दीपावली उत्सव मनाया जाता है । दीपावली शब्द दीप आवली (पंक्ति, कतार) इस प्रकार बना है । इसका अर्थ है, दीपोंकी पंक्ति अथवा कतार । दीपावलीके दिन सर्वत्र दीप लगाए जाते हैं । कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनत्रयोदशी / धनतेरस), कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (नरकचतुर्दशी), अमावस्या (लक्ष्मीपूजन) व कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (बलिप्रतिपदा) ये चार दिन दीपावली मनाई जाती है । कुछ लोग त्रयोदशीको दीपावलीमें सम्मिलित न कर, शेष तीन दिनोंकी ही दीवाली मनाते हैं । वसुबारस व भैयादूजके दिन दीपावलीके साथ ही आते हैं, इसी कारण इनका समावेश दीपावलीमें किया जाता है; परंतु वास्तवमें ये त्यौहार भिन्न हैं ।

१.१. कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनत्रयोदशी)

इसीको बोली भाषामें धनतेरस कहा जाता है । इस दिन व्यापारी तिजोरीका पूजन करते हैं । व्यापारी वर्ष, दीवालीसे दीवालीतक होता है । नए वर्षके हिसाबकी बहियां इसी दिन लाते हैं । आयुर्वेदकी दृष्टिसे यह दिन धन्वंतरि जयंतीका है । वैद्य मंडली इस दिन धन्वंतरि (देवताओंके वैद्य) का पूजन करते हैं । लोगोंको नीमके पत्तोंके छोटे टुकडे व शक्कर प्रसादके रूपमें बांटते हैं । इसका गहरा अर्थ है । नीमकी उत्पत्ति अमृतसे हुई है । इससे प्रतीत होता है, कि धन्वंतरि अमृतत्वका दाता है ।

१.२ यमदीपदान

यमराजका कार्य है प्राण हरण करना । कालमृत्युसे कोई नहीं बचता और न ही वह टल सकती है; परंतु `किसीको भी अकाल मृत्यु न आए', इस हेतु धनत्रयोदशीपर यमधर्मके उद्देश्यसे गेहूंके आटेसे बने तेलयुक्त (तेरह) दीप संध्याकालके समय घरके बाहर दक्षिणाभिमुख लगाएं । सामान्यत: दीपोंको कभी दक्षिणाभिमुख नहीं रखते, केवल इसी दिन इस प्रकार रखते हैं । आगे दी गई प्रर्थना करें – `ये तेरह दीप मैं सूर्यपुत्रको अर्पण करता हूं । वे मृत्युके पाशसे मुझे मुक्त करें व मेरा कल्याण करें ।'

१.३ नरकचतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी)

श्रीमद्‌भागवतपुराणमें ऐसी एक कथा है – नरकासुरका अंत कर कृष्णने सर्व राजकुमारियोंको मुक्त किया । मरते समय नरकासुरने कृष्णसे वर मांगा, कि `आजके दिन मंगलस्नान करनेवाला नरककी पीडासे बच जाए ।' कृष्णने उसे तदनुसार वर दिया । इस कारण कार्तिक कृष्ण चतुर्दशीको नरकासुर चतुर्दशीके नामसे मानने लगे व इस दिन लोग सूर्योदयसे पूर्व अभ्यंगस्नान करने लगे ।

१.४ त्यौहार मनानेकी पद्धति

  • आकाशमें तारोंके रहते, ब्राह्ममुहूर्तपर अभ्यंग (पवित्र) स्नान करते हैं ।

  • यमतर्पण : अभ्यंगस्नानके पश्चात् अपमृत्युके निवारण हेतु यमतर्पणकी विधि बताई गई है । तदुपरांत माता पुत्रोंकी आरती उतारती हैं ।

  • दोपहरमें ब्राह्मणभोजन व वस्त्रदान करते हैं ।

  • प्रदोषकालमें दीपदान, प्रदोषपूजा व शिवपूजा करते हैं ।

१.५ कार्तिक अमावस्या (लक्ष्मीपूजन)

सामान्यत: अमावस्या अशुभ मानी जाती है; यह नियम इस अमावस्यापर लागू नहीं होता है । इस दिन `प्रात:कालमें मंगलस्नान कर देवपूजा, दोपहरमें पार्वणश्राद्ध व ब्राह्मणभोजन एवं संध्याकालमें (प्रदोषकालमें) फूल-पत्तोंसे सुशोभित मंडपमें लक्ष्मी, विष्णु इत्यादि देवता व कुबेरकी पूजा, यह इस दिनकी विधि है ।

लक्ष्मीपूजन करते समय एक चौकीपर अक्षतसे अष्टदल कमल अथवा स्वस्तिक बनाकर उसपर लक्ष्मीकी मूर्तिकी स्थापना करते हैं । लक्ष्मीके समीप ही कलशपर कुबेरकी प्रतिमा रखते हैं । उसके पश्चात् लक्ष्मी इत्यादि देवताओंको लौंग, इलायची व शक्कर डालकर तैयार किए गए गायके दूधसे बने खोयेका नैवेद्य चढाते हैं । धनिया, गुड, चावलकी खीलें, बताशा इत्यादि पदार्थ लक्ष्मीको चढाकर तत्पश्चात् आप्तेष्टोंमें बांटते हैं । ब्राह्मणोंको व अन्य क्षुधापीडितोंको भोजन करवाते हैं । रातमें जागरण करते हैं । पुराणोंमें कहा गया है, कि कार्तिक अमावस्याकी रात लक्ष्मी सर्वत्र संचार करती हैं व अपने निवासके लिए योग्य स्थान ढूंढने लगती हैं । जहां स्वच्छता, शोभा व रसिकता दिखती है, वहां तो वह आकर्षित होती ही हैं; इसके अतिरिक्त जिस घरमें चारित्रिक, कर्तव्यदक्ष, संयमी, धर्मनिष्ठ, देवभक्त व क्षमाशील पुरुष एवं गुणवती व पतिकाता स्त्रियां निवास करती हैं, ऐसे घरमें वास करना लक्ष्मीको भाता है ।

१.६ बलिप्रतिपदा (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा)

यह साढेतीन मुहूर्तोंमेंसे अर्द्ध मुहूर्त है । इसे विक्रम संवत्के वर्षारंभदिनके रूपमें मनाया जाता है ।

बलिप्रतिपदाके दिन जमीनपर पंचरंगी रंगोलीद्वारा बलि व उनकी पत्नी विंध्यावलीके चित्र बनाकर उनकी पूजा करनी चाहिए, उन्हें मांस-मदिराका नैवेद्य दिखाना चाहिए । इसके पश्चात् बलिप्रीत्यर्थ दीप व वस्त्रका दान करना चाहिए । इस दिन प्रात:काल अभ्यंगस्नान करनेके उपरांत स्त्रियां अपने पतिकी आरती उतारती हैं । दोपहरमें ब्राह्मणभोजन व मिष्टान्नयुक्त भोजन बनाती हैं । इस दिन गोवर्धनपूजा करनेकी प्रथा है । गोबरका पर्वत बनाकर उसपर दूर्वा व पुष्प डालते हैं व इनके समीप कृष्ण, ग्वाले, इंद्र, गाएं, बछडोंके चित्र सजाकर उनकी भी पूजा करते हैं ।

१.७ भैयादूज (यमद्वितीया, कार्तिक शुक्ल द्वितीया)

  • अपमृत्युको टालने हेतु धनत्रयोदशी, नरकचतुर्दशी व यमद्वितीयाके दिन मृत्युके देवता, यमधर्मका पूजन कर उनके चौदह नामोंका तर्पण करनेके लिए कहा गया है । इससे अपमृत्यु नहीं आती । अपमृत्यु निवारणके लिए `श्री यमधर्मप्रीत्यर्थं यमतर्पणं करिष्ये' । ऐसा संकल्प कर तर्पण करना चाहिए ।

  • इस दिन यमराज अपनी बहन यमुनाके घर भोजन करने जाते हैं व उस दिन नरकमें सड रहे जीवोंको वह उस दिनके लिए मुक्त करते हैं ।

 इस दिन किसी भी पुरुषको अपने घरपर या अपनी पत्नीके हाथका अन्न नहीं खाना चाहिए । इस दिन उसे अपनी बहनके घर वस्त्र, गहने इत्यादि लेकर जाना चाहिए व उसके घर भोजन करना चाहिए । ऐसे बताया गया है, कि सगी बहन न हो तो किसी भी बहनके पास या अन्य किसी भी स्त्रीको बहन मानकर उसके यहां भोजन करना चाहिए । किसी स्त्रीका भाई न हो, तो वह किसी भी पुरुषको भाई मानकर उसकी आरती उतारे । यदि ऐसा संभव न हो, तो चंद्रमाको भाई मानकर आरती उतारते हैं ।

२. हिंदुओं, पटाखे न जलाकर, धर्माचरण करे !

वर्तमानमें हिंदुओंके देवताओंके नामकोंका व उनके चित्रोंका उपयोग उत्पादों तथा उनकी विज्ञप्तिके लिए किया जाता है । दिवालीके संदर्भमें इसका उदाहरण देना हो, तो पटाखोंके आवरणपर प्राय: लक्ष्मीमाता तथा अन्य देवताका चित्र होता है । देवताओंके चित्रवाले पटाखे जलानेसे उस देवताके चित्रके चिथडे उछलते हैं और वे चित्र पैरोंतले रौंदे जाते हैं । यह देवता, धर्म व संस्कृतिकी घोर विडंबना है । देवता व धर्मकी विडंबना रोकनेके लिए प्रयास करना ही खरा लक्ष्मीपूजन है ।

३. रंगोली




 

मूल संस्कृत शब्द रंगवल्ली । विशेष शुभ्र चूर्णको चुटकीमें भर उससे जमीनपर बनाई गई रेखांकित आकृतियोंको रंगोली कहते हैं । रंगोली बनानेकी कला मूर्तिकला व चित्रकलाके पूर्वकी है । किसी भी धार्मिक अथवा मंगलकार्यमें रंगोली आवश्यक एवं प्राथमिक विषय है । दीपावलीके त्योहारपर द्वारके सामने व आंगनमें विविध प्रकारकी रंगोली बनाकर उनमें विविध रंग भरते हैं ।

 

अंग्रेजी भाषामें जानकारीके लिए पढें : http://www.hindujagruti.org/hinduism/festivals/diwali/


 

अधिक जानकारी हेतु अवश्य पढे सनातनका ग्रंथ – त्योहार धार्मिक उत्सव व व्रत

सनातन संस्था धर्मजागृति व धर्मप्रसारका कार्य करती है । इसीके अंतर्गत इस लेखमें `दिवालीके दिनोंका शास्त्र व उस दिन की जानेवाली धार्मिक कृतियां व उनका शास्त्र' इस विषयपर अंशमात्र जानकारी प्रस्तुत की गई है । अधिक जानकारीके लिए संपर्क करें : sanatan@sanatan.org

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