नव वर्ष ३१ दिसंबर को नहीं, अपितु गुढीपाडवा को मनाकर हिंदु संस्कृति की रक्षा करें !

‘विद्यार्थी मित्रो, कोई कृत्य करने से पूर्व उसे क्यों करें ? उसका आधारभूत शास्त्र एवं उसका इतिहास क्या है ?, ये सर्व बातें हम देखते हैं ।फिर ‘आजकल लोग नया वर्ष ३१ दिसंबर को क्यों मनाते हैं ? इसके पीछे क्याशास्त्र है अथवा क्या इतिहास है ?’, ऐसे प्रश्न आपके मन में नहीं उठते हैं क्या? बिना किसी शास्त्रीय आधार के अथवा इसके पीछे के इतिहास को जाने बिना,केवल पाश्चात्यों का अंधानुकरण करते हुए हम ३१ दिसंबर को नया वर्ष मनातेहैं । इसके फलस्वरूप नववर्ष का प्रारंभ कैसे होता है, यह हम देख ही रहे हैं ।

अब हम अंग्रेजी माह के अनुसार वर्ष का आरंभ १ जनवरी तथा हिंदू धर्मानुसारवर्षारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा में चित्ररूप अंतर देखेंगे !

३१ डिसेंबर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुढीपाडवा)


मध्यरात्रि से दूसरे दिन का आरंभ


सुर्योदय से दिन का प्रारंभ हो ता है



वातावरण में कोई परिवर्तन नहीं


प्रकृति में सकारात्मक परिवर्तन


इसके पीछे कोई आध्यात्मिक अथवा
वैज्ञानिक कारण न होना



आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक कारण होना

रात्रि १२ बजे के उपरांत डीजे के कर्णकर्कश नाद, मद्यपान करनाचनेवाले एवं झगडनेवाले युवाओं के सहवास में वर्ष का प्रारंभ हमें उचित लगताहै क्या ? यह देखकर क्या हमें सचमुच लगता है कि यह नववर्षारंभ है ? आपही इसपर विचार कर मुझे बताएं कि हमारे दिन का प्रारंभ दुःखसे होना हमेंअच्छा लगेगा क्या ? नहीं न ? हिंदू संस्कृति के अनुसार रात्रि १२ बजे केउपरांत का समय असुरों का माना जाता है । फिर ऐसे वातावरण में वर्षारंभ कैसे हो सकता है ?

मित्रो, आइए नववर्षारंभ से संबंधित जानकारी देनेवाली दृश्य श्रव्यचक्रिका देखेंगे ।

अपनी हिंदू संस्कृति के अनुसार हम संवत्सरारंभपर नववर्ष क्यों मनाते हैं, यह ज्ञात है न ? वह इसलिए कि इस दिन ब्रह्मदेवने सृष्टि की रचना की थी। यदि इतिहास के पन्ने पलटकर देखेंगे, तो इसी दिन प्रभू श्रीरामने दुष्ट वाली का भी वध किया । इसीलिए इस दिन हम नया वर्ष मनाते हैं ।

संवत्सरारंभ के दिन नववर्षारंभ मनाते समय हम प्रात: अभ्यंगस्नान(मांगलिक स्नान अर्थात शरीर को तेल मिश्रित उबटन लगाकर, गुनगुने पानी से नहाना) कर घर के सामने रंगोली बनाते हैं । हिंदू संस्कृति के अनुसार वेशभूषाकर प्रभात फेरियों में सम्मिलित होकर भजन-कीर्तन गाते हैं, शहनाई बजाते हैंतथा शंखनाद करते हैं ।फिर बालमित्रो, अब आप ही बताएं कि वर्ष का आरंभ किस दिन से करना चाहिए ?

मित्रो, हिंदू संस्कृति के प्रत्येक दिन तथा त्यौहार के पीछे कुछ न कुछशास्त्र तथा इतिहास होता है, जो अपने जीवन के आनंद को दुगुना कर देता है ।हिंदू संस्कृति ही विश्वा को आनंदमय जीवनशैली प्रदान कर सकती है । इसलिए ऐसी महान संस्कृतिद्वारा निर्धारित किया गया वर्षारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाकर हम भी आनंदमय जीवनयापन करेंगे ।

अबसे हम भी अपने मित्रों को संवत्सरारंभपर ही नए वर्ष की शुभकामनाएं देकर हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए सिद्ध होंगे ।’

– श्री. राजेंद्र पावसकर (गुरुजी), पनवेल.