‘आत्महत्या ’ से जीवन का अंत नहीं होता !

कुछ वर्ष पूर्व माध्यमिक एवं महाविद्यालयीन परीक्षाओं के परिणाम घोषित होते ही असफल विद्यार्थियों की आत्महत्या के कुछ समाचार सुनने में आए थे । अब तो निराशा, अभ्यास का तनाव, माता-पिता के कठोर वचन, प्रेमभंग आदि कारणों से विद्यार्थी सहजता से आत्महत्या करते हैं । वर्ष २०१० के आरंभिक कुछ दिनों में ही १५ से अधिक विद्यार्थियों ने आत्महत्या की थी । समस्यापर उपाय ‘आत्महत्या’ नहीं, यह तो पूर्णतः पलायन है ।

विद्यार्थियो, आप कभी यह विचार करते हैं क्या …

१.आत्महत्या के लिए एक ही, तो जीवन जीने के अनेक कारण होते हैं ।

२.अपने माता-पिता को वृद्धावस्था में संभालने का दायित्व हमपर होता है ।

३.प्राणी, वनस्पति इस प्रकार से ८४ लाख योनियों में भटकने के पश्चात् हमें ‘मनुष्य जन्म’ मिला है । यह जन्म इस प्रकार से व्यर्थ गंवाना बुद्धिमानी है क्या ?

४.छ. शिवाजी महाराज, लो. तिलक, स्वा. सावरकर समान राष्ट्रपुरुषों तथा संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम महाराज समान संतों को भी अनेक प्रकार के दुःख भोगने पडे थे । उनकी तुलना में तो हमारा दुःख कुछ भी नहीं है । आज भोगा जानेवाला दुःख काल के प्रवाह में नष्ट हो जाता है, यह ध्यान में रखिए !

आत्महत्यापर खरा उपाय ‘साधना’ !

मनुष्य का आत्महत्या के लिए प्रवृत्त होने का वास्तविक कारण ‘मन की दुर्बलता’ । ध्यान लगाना, देवता का नामजप आदि साधना करने से मनोबल बढकर जीवन में स्थिरता आती है । ऐसा मनुष्य आत्महत्या के विचारपर सहजता से विजय प्राप्त करता है ।