किस स्थान पर कब कुंभमेला होता है ?

सारिणी


कौनसे स्थानपर कुंभमेला कब आयोजित किया जाए, यह ग्रहगणितपर आधारित है । देव-दानवोंके युद्धमें चंद्र, रवि एवं गुरुने देवताओंकी विशेष सहायता की । इसलिए उनकी विशिष्ट स्थितिपर कुंभपर्वका काल निश्चित होता है । इसमें ‘गुरु’ ग्रहको अधिक महत्त्व दिया गया है । गुरु ग्रह एक राशिमें लगभग तेरह मास (माह) रहता है ।

१. प्रयाग कुंभमेला

१ अ. महाकुंभमेला

जब गुरु वृषभ राशिमें एवं चंद्र-सूर्य मकर राशिमें रहते हैं, तब प्रयागके त्रिवेणी संगमपर कुंभपर्व हेतु श्रद्धालु एकत्रित होते हैं । यहां गंगा, यमुना तथा सरस्वतीके त्रिवेणी संगमपर प्रत्येक १२ वर्षमें कुंभमेलेका आयोजन होता है, जिसे ‘महाकुंभमेला’ भी कहते हैं ।

इस कुंभपर्वमें मकर संक्रांति, माघ अमावस्या एवं वसंतपंचमी, ये तीन उपपर्व पडते हैं । इनमें ‘अमावस्या’ प्रमुख पर्व है तथा इसे ‘पूर्णकुंभ’ कहते हैं । माघी पूर्णिमाको ‘पर्वकाल’ माना जाता है । इन चार पर्वोंपर गंगास्नानका विशेष महत्त्व है । इस दिन प्रयागतीर्थमें स्नान करनेपर १ सहस्र अश्वमेध यज्ञ, १०० वाजपेय यज्ञ तथा पृथ्वीकी १ लाख परिक्रमा करनेका पुण्य मिलता है । एक कुंभस्नानका फल है – १ सहस्र कार्तिक स्नान, १०० माघ स्नान एवं नर्मदाके १ कोटि वैशाख स्नान ।

प्रयागके कुंभमेलेके समय चंद्रसे प्रक्षेपित तरंगें मानसिक विकासके लिए पूरक होना तथा सूर्यसे प्रक्षेपित तरंगें बुद्धिकी प्रगल्भताके लिए पूरक होना : ‘जब वृषभ राशिमें गुरु तथा मकर राशिमें चंद्र एवं सूर्य होते हैं, उस समय मकर राशिके चंद्रसे प्रक्षेपित तरंगें मानसिक विकासके लिए पूरक होती हैं तथा मकर राशिके सूर्यसे प्रक्षेपित तरंगें बुद्धिकी प्रगल्भताके लिए पूरक होती हैं । वृषभ राशिके गुरुसे प्रक्षेपित तरंगें आपतत्त्वरूपी चैतन्यसे संचारित होती हैं ।  इन तीनों तरंगोंकी एकत्रित ऊर्जासे प्रयागक्षेत्रमें पृथ्वीमंडल उस विशिष्ट कालमें दैवी तत्त्वसे संचारित होता है ।

इसी कालावधिमें प्रयागक्षेत्रमें इन तरंगोंको आकर्षित करनेवाली आकर्षणशक्ति उत्पन्न होती है । इस आकर्षणशक्तिके बवंडरमें उन विशिष्ट ग्रहोंके द्वारा प्रक्षेपित विशिष्ट दैवी ऊर्जा बद्ध होती है । इसलिए इसी क्षेत्रमें ठीक इसी कालमें कुंभमेलेका आयोजन किया जाता है ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली मुकुल गाडगीळके माध्यमसे, कार्तिक कृष्ण पक्ष २, कलियुग वर्ष ५११४ (३१.१०.२०१२), दिन १०.२२)

१ आ.  माघमेला एवं अर्धकुंभमेला

इस पवित्र त्रिवेणी संगमपर प्रतिवर्ष माघ मासमें मेला लगता है । इसे ‘माघमेला’ कहा जाता है । माघ मासकी अमावस्याके दिन संन्यासीजनोंका विशाल समुदाय स्नान करने हेतु जुटता है । प्रत्येक ६ वर्षमें लगनेवाले माघमेलेको ‘अर्धकुंभमेला’ कहा जाता है ।

 

२. हरद्वार (हरिद्वार) कुंभमेला

जब सूर्य मेष राशिमें रहता है एवं गुरु कुंभ राशिमें प्रवेश करते हैं, उस समय हरद्वारका (हरिद्वारका) कुंभमेला होता है ।

हरद्वार (हरिद्वार) कुंभमेलेके समय सूर्यसे प्रक्षेपित तेजतरंगोंमें स्थूलदेहकी शुद्धि करनेकी क्षमता होना तथा गुरुसे प्रक्षेपित तेजतरंगें मनोदेहकी शुद्धिके लिए पूरक एवं पुष्टिदायक होना : ‘हरद्वार (हरिद्वार) कुंभमेलेके समय सूर्य मेष राशिमें एवं गुरु कुंभ राशिमें प्रवेश करते हैं । इस अवस्थामें मेष राशिके सूर्यसे प्रक्षेपित तेजतरंगोंमें स्थूलदेहकी शुद्धि करनेकी क्षमता अधिक होती है, जबकि कुंभराशिकी गुरुतरंगें इसी समय मनोदेहकी शुद्धिके लिए पूरक एवं पुष्टिदायक होती हैं ।

इन दोनोंके संयोगवश जो ऊर्जा ब्रह्मांडमंडलमें जागृत होती है, वह क्रियाशक्तिद्वारा हरद्वार (हरिद्वार) क्षेत्रमें उस कालमें विद्यमान आकर्षणशक्तिके बवंडरमें आकर्षित होती है, जिससे वहां पुण्यक्षेत्र बनता है । जब उस विशिष्ट पुण्यरूपी ऊर्जाका इस स्थानपर अधिकतम घनीकरण होता है, तब ‘हरिद्वार कुंभमेले’का आयोजन किया जाता है ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली मुकुल गाडगीळके माध्यमसे, कार्तिक कृष्ण पक्ष २, कलियुग वर्ष ५११४ (३१.१०.२०१२), दिन १०.२२)

 

३. उज्जैन कुंभमेला

जब सूर्य मेष राशिमें एवं गुरु सिंह राशिमें होते हैं, तब उज्जैनमें कुंभमेला होता है ।

उज्जैन कुंभमेलेके समय मेष राशिका सूर्य बुद्धिमें विद्यमान तेजतत्त्व जागृत करनेवाला, अर्थात उसे प्रज्ञाजागृतिकी ओर ले जानेवाला तथा सिंह राशिका गुरु चित्तशक्तिको जागृत करनेवाला होना : ‘उज्जैन कुंभमेलेके समय सूर्य मेष राशिमें एवं गुरु सिंह राशिमें होते हैं । मेष राशिका सूर्य बुद्धिमें विद्यमान तेजतत्त्व जागृत करनेवाला, अर्थात उसे प्रज्ञाजागृतिकी ओर ले जानेवाला, जबकि सिंह राशिका गुरु चित्तशक्तिको जागृत करनेवाला, अर्थात चित्तके संस्कारोंको घटाकर उस स्थानपर चैतन्यका संकरण करनेवाला होता है ।

इन दो ग्रहोंसे प्रक्षेपित विशिष्ट दैवी तरंगोंकी ऊर्जाको पृथ्वीमंडलमें ‘उज्जैन’ नामक पुण्यक्षेत्रमें उस विशिष्ट कालमें विद्यमान तेजरूपी आकर्षणशक्तिका बवंडर अपनी कार्यरत ऊर्जाकी सहायतासे खींच लेता है एवं कुछ ही घंटोंमें अपने वायुमंडलमें अपनी कार्यरत शक्तिद्वारा बद्ध कर देता है । इस प्रकार उज्जैनक्षेत्रमें पुण्यकाल तथा पुण्यक्षेत्र बनता है । इसी पुण्यदायी योगका लाभ लेकर उज्जैनमें कुंभमेलेका आयोजन किया जाता है ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, कार्तिक कृष्ण पक्ष २, कलियुग वर्ष ५११४ ड३१.१०.२०१२)

 

४. त्र्यंबकेश्वर-नासिक कुंभमेला

सिंहस्थ कुंभमेला

जब गुरु एवं सूर्य दोनों सिंह राशिमें आते हैं, तब त्र्यंबकेश्वर-नासिकमें सिंहस्थ कुंभमेलेका पर्वकाल माना जाता है । गुरुग्रहके सिंह राशिमें प्रवेश करनेके मुहूर्तपर नासिकमें कुंभमेलेका आयोजन होता है । इसलिए इसे ‘सिंहस्थ’की उपाधि लगाई जाती है । पुराणमें वर्णित है कि सिंहस्थके १३ मासके पुण्यकालमें नासिक क्षेत्रमें साढेतीन कोटि तीर्थ एवं तैंतीस कोटि देवता गोदावरी नदीके संपर्कमें आते हैं ।

त्र्यंबकेश्वर-नासिक कुंभमेलेके समय सिंह राशिके गुरु एवं सूर्यसे बलिष्ठ रूपमें प्रक्षेपित तेजतरंगोंके वेगवान प्रवाहको आकर्षित करनेवाले प्रकाशतरंगोंका क्षेत्र ‘त्र्यंबकेश्वर-नासिक’में उत्पन्न होना : ‘त्र्यंबकेश्वर-नासिक कुंभमेलेके समय गुरु तथा सूर्य दोनों सिंह राशिमें प्रवेश करते हैं । इस संयोगमें दोनों ग्रहोंकी ओरसे तेजतरंगोंका वेगवान प्रवाह बलिष्ठ रूपमें पृथ्वीमंडलकी ओर तीव्र गतिसे दौडता है । इसी कालमें ‘त्र्यंबकेश्वर-नासिक’ क्षेत्रमें भूगर्भकी तेजरूपी शक्ति प्रकाशतरंगोंके रूपमें वहांपर पहलेसे ही कार्यरत रहती है । ये तरंगरूपी प्रकाशऊर्जा सिंह राशिके गुरु एवं सूर्यसे प्रक्षेपित तेजोमय तरंगोंको आकर्षित करती है तथा अपनी कार्यशक्तिमें बद्ध करती है । इसी संयोगसे पुण्यक्षेत्रकी निर्मिति हुई है तथा इस स्थानपर कुंभमेलेका आयोजन किया जाता है ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, कार्तिक कृष्ण पक्ष २, कलियुग वर्ष ५११४ (३१.१०.२०१२), दिन १०.२२)

(संदर्भ – सनातनका ग्रंथ – कुंभमेलेकी महिमा एवं पवित्रताकी रक्षा )