धर्मकी जीत हुई ! – शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती

माघ कृष्ण पक्ष द्वादशी, कलियुग वर्ष ५११५

सारिणी



दीपावलीके आरंभमें ११ नवंबरको २००४ की उत्तररातको श्री कांची कामकोटि पीठके ६९ वें पीठाधीश्वर श्रीमत जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती तथा उनके उत्तराधिकारी विजयेंद्र सरस्वती को शंकररमन्की हत्याके आरोपमें बंदी बनाया गया । तत्पश्चात १० जनवरी २००५ को शंकराचार्य तो १० फरवरी २००५ को विजयेंद्र सरस्वती प्रतिभूपर छोड दिए गए । २७ नवंबर २०१३ को पुद्दुचेरी सत्र न्यायालयने इन दोनोंके साथ अन्य २१ व्यक्तियोंको भी इस अपराधसे निर्दोष मुक्त किया । इन नौ वर्षोंकी कालावधिमें कोई सामान्य व्यक्ति एकदम टूट जाता । यह श्रीमत जगद्गुरु तथा उनके मठकी प्रतिष्ठाको कालिख पोतनेका एक पूर्वनियोजित षडयंत्र था । प्रसिद्धिमाध्यमोंके एक विशिष्ट गुटद्वारा निरंतर की जानेवाली मानहानिसे यह स्पष्ट दिख रहा था । आदि शंकराचार्यकी परंपरासे एक ऋषितुल्य सत्पुरुषने इन आरोपोंके अन्वेषणका सामना कैसे किया, ऐसा प्रश्न प्रत्येकके मनमें आया होगा । प्रत्यक्ष शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वतीने अपने निर्दोष मुक्त होनेके पश्चात ‘द हिंदू’ दैनिकको दिए साक्षात्कारमें इस प्रश्नका उत्तर दिया है । नौ वर्ष पूर्वकी कालावधिमें उनका, उनके शिष्योंका तथा आद्य शंकराचार्यने २५०० वर्षपूर्व स्थापित किए ‘कांची कामकोटि पीठका जीवन’ इस विषयमें उनका संपूर्ण साक्षात्कार प्रश्नोत्तरके रूपमें प्रसिद्ध कर रहे हैं ।

१. मेरे गुरुद्वारा प्रत्येक बातका सामना करने हेतु सिद्ध करनेके कारण परिस्थिति कठिन होनेका प्रश्न ही नहीं उठता !

प्रश्न : आपको इस निर्णयके विषयमें क्या लगता है ?
शंकराचार्य : धर्मकी जीत हुई । सत्यकी जीत हुई । जो सत्य है, वही सामने आया है ।
प्रश्न : बीते ९ वर्ष आपकी दृष्टिसे कैसे थे ?
शंकराचार्य : मठके अधिकारियोंको अभियोगसे संबंधित विषयों हेतु अतिरिक्त समय देना पडता था, यह अपवाद छोडकर ये ९ वर्ष करीब-करीब एक जैसे ही थे ।
प्रश्न :क्या वह परिस्थिति कठिन थी ?
शंकराचार्य : मेरे गुरुने मुझे प्रत्येक बातका सामना करने हेतु सिद्ध किया है । अत: परिस्थिति कठिन होनेका प्रश्न ही नहीं उठता । वह काल आह्वानात्मक था; कारण हम  पूर्णत: नई घटनाओंका सामना कर रहे थे ।
प्रश्न : क्या आप दोनोंको कोई भी समस्या नहीं थी ?
शंकराचार्य : हमारा कार्य तथा नित्यकर्म तितर-बितर हो गया था । आरंभमें हमपर अनेक निर्बंध थे; किंतु तत्पश्चात अलग होनेपर भी अपना कार्य कैसे आरंभ रखें, यह हमारे ध्यानमें आया ।

२. प्रतिभू पर छूटनेके पश्चात पुलिसकी छुपी दृष्टी !

प्रश्न : सामनेसे देखनेपर अनेक भक्तोंने आप दोनोंके दर्शन हेतु आना छोड दिया था । साथ ही मठमें आयोजित होनेवाले महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमोंकी संख्या भी घट गई थी ।
शंकराचार्य : क्या यह अपेकि्षत नहीं था ? समाजके सारे प्रभावी घटकोंद्वारा इस प्रकारका  पूर्वनियोजित मुहीम कार्यान्वित करनेपर सर्वसाधारण व्यक्ति क्या करेगा ? अनेक व्यक्तियोंने निर्धोक मार्गका आलंबन कर मठमें अपने भ्रमणकी निरंतरता अल्प की । क्या आप जानते हैं, कि मेरे प्रतिभूपर छूटनेके पश्चात हमपर अखंड छुपी दृष्टी रखी जा रही थी तथा मुझसे मिलने आनेवाले प्रत्येक भक्तकी जांच की जा रही थी । चारों ओर साधारण वस्त्रोंमें पुलिस थी । आरंभके दिनोंमें मैं अपने भक्तोंको उसे सहजतासे लेने हेतु कहता था । अब पूर्व जैसे लोग आने लगे हैं । हाल ही में मठमें भक्तोंकी भीड पूर्वसे कई गुना बढ गई है ।

३. ९ वर्ष पूर्वसे बडी मात्रामें कार्य आरंभ रहा !

प्रश्न : क्या मठकी सर्वसामान्य परिसि्थति पुनस्र्थापित हो गई है ?
शंकराचार्य : चंद्रमौळेश्वरकी दैनंदिन पूजा एक दिन भी खंडित नहीं हुई । प्रत्येक धार्मिक समारोह जिस प्रकार मनाया जाना चाहिए उसी प्रकार मनाया जा रहा है । कुछ भी खंडित नहीं हुआ । मठके सारे नित्यकर्म पर्वके जैसे ही चल रहे हैं ।
प्रश्न : आपने स्वयंको कैसे व्यस्त रखा ?
शंकराचार्य : प्रार्थना, पढना, ध्यानधारणा आदिके द्वारा । मैं यात्रा, अलग-अलग स्थानोंके श्रद्धालुओंसे भेंट करना, महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमोंमें उपसि्थत रहना आदिमें व्यस्त रहता था । ९ वर्ष पूर्वसे बडी मात्रामें कार्य आरंभ है ।
प्रश्न : उदाहरणार्थ ?
शंकराचार्य : मैं आपको अनेक उदाहरण दे सकता हूं , एक उदाहरण बताता हूं । ख्रिस्ताब्द २००७ हमारे महास्वामीद्वारा मठके पीठाधीश्वरपदपर आसीन होनेका शताब्दी वर्ष था । उनकी तमिल भाषाके व्याख्यान, जो हिंदु धर्ममें अधिकृत प्रबंध माने जाते हैं, (लगभग १० सहस्र पन्ने ) अंग्रेजी तथा अनेक भारतीय भाषाओंमें भाषांतरित किए गए । ज्येष्ठ ऋषियोंके संदर्भमें कई पुस्तकें प्रकाशित की गई। अत: संपूर्ण भारतमें अनेक व्यक्तियोंतक पहुंचनेमें हमें सहायता प्राप्त हुई । मैंने देशके अनेक हिस्सोंमें अपनी यात्रा आरंभ रखी । उस समय श्री बालास्वामीने कांचीपुरम् रहकर दैनंदिन पूजा-पाठ, मठसंबंधी कार्य, मठमें दर्शन हेतु आनेवाले सहस्रावधि श्रद्धालुओंको आशीर्वचन देना आदि कार्यभार संभाला ।

प्रश्न : इस कालावधिमें आपको सबसे प्रिय अपने रुग्णालयका प्रकल्प छोड देना पडा, क्या आपको इसका खेद नहीं लगता ?
शंकराचार्य : प्रथम बात तो यह है कि मेरा कोई भी प्रिय प्रकल्प नहीं है । दूसरी बात जरूरतमंद तथा उचित लोगोंकी सेवा जिस मार्गद्वारा कर सकूं, ऐसी कोई भी बात मैं छोडता नहीं । यदि वह प्रकल्प कार्यान्वित नहीं हुआ, तो अन्य कोई प्रकल्प कार्यान्वित किया जाएगा । आपको यदि कुछ महत्त्वपूर्ण बात करनी हो, तो आपको मार्गमें आनेवाली बाधाओंको पार करना पडता है । हम निश्चित किए गए कार्यक्रमानुसार उचित कार्य संपन्न करनेवाले हैं ।

४. मुझे मेरे गुरुकी आज्ञाका पालन कर उनकी इच्छा पूरी करनी है!

प्रश्न : अब आपका स्वास्थ्य कैसा है ?
शंकराचार्य : अब मैं ठीक हूं । एक ७९ वर्ष आयुका व्यक्ति जितना हट्टाकट्टा हो सकता है, उतना मैं हूं । मेरी सेवा मैं पूर्व जैसा ही संपन्न कर रहा हूं ।
प्रश्न : इस अभियोगके आरंभमें, जिन लोगोंने आप दोनोंका चारित्र्यहनन किया तथा अत्यंत संवेदनशील लेख छापे, उन सबके विरुद्ध क्या आप न्यायालयमें जाओगे ?
शंकराचार्य : मैं पहले ही अमूल्य नौ वर्ष खो चुका हूं तथा अभी बहुत कुछ करना  है । शेष समयमें मुझे मेरे गुरुकी आज्ञाका पालन करना है तथा उनकी इच्छा पूरी करनी है ।

प्रश्न : भविष्यमें आपकी क्या योजना है ?
शंकराचार्य : हम केवल चार बातोंपर ध्यन देनेवाले हैं । वे इस प्रकार हैं ….
१. मेरे गुरुकी इच्छापूर्ति, वेद अध्ययन तथा उसके तत्त्वप्रसार हेतु उचित समर्थन देनेका विश्वास दिलाना
२. आद्य शंकराचार्यद्वारा दी गई सीख आगे ले जाना
३. मंदिरोंका नूतनीकरण तथा उन्हें ठीक करना
४. निर्धन तथा जरुरतमंदोंको शिक्षा, आरोग्य सेवा तथा व्यावसायिक समर्थन उपलब्ध कराना

५. धर्माचरण करना तथा उसका प्रसार करना, अपना उत्तरदायित्व है !

प्रश्न : क्या मठको उसकी पूर्व गरिमा पुन: प्राप्त होगी ?
शंकराचार्य : मठके आध्यात्मिक कार्य तथा समाजसेवाके कारण उसकी गरिमामें बढोतरी ही हुई है । मेरे गुरु तथा मैं देशके कोनेकोने तक पहुंच चुके हैं, एकदम छोटेसे छोटे गांवतक जाकर पूजा की है । सहस्रों विद्यालय तथा आरोग्य केंद्र पुनर्जीवित करने हेतु हम प्रयत्नशील हैं । धर्माचरण करना तथा उसका प्रसार करना, अपना उत्तरदायित्व है । लोगोंको उनके जीवन सार्थक होने तथा शांत जीवन जीने हेतु सहायता करना, मठके माध्यमसे हम यही कार्य करते आए हैं, तथा निरंतर करते रहेंगे । जो करना आवश्यक है, वह हम निरंतर करते रहेंगे । समृद्धिका क्या है, आएगी तथा जाएगी । लोगोंकी जो सेवा हम करते हैं, वह निरंतर चलती रहनी चाहिए । जहांतक श्रद्धालुओंका प्रश्न है, एक बार श्रद्धा तथा लगाव उत्पन्न होनेपर वे स्थायी रूपसे भक्त बनकर मठसे जुडनेवाले हैं । आद्य शंकराचार्य तथा हमारे गुरुने अपने भक्तोंकी आध्यात्मिक उन्नति हेतु सहायता करनेके अनेक मार्ग बता दिए हैं ।

६. मठपर हुए आक्रमणके इतिहासद्वारा आक्रमणकर्ताओंको भी ध्यानमें रखा जाएगा !

प्रश्न : क्या यह घटना आश्रमपर स्थायी रूपसे लगा एक धब्बा नहीं है ?
शंकराचार्य : कितने ही आक्रमणकर्ताओंने अपने मंदिरोंकी विडंबना की है । आज जब आप भग्न मंदिर देखते हैं, तब आपको आक्रमणकर्ता तथा उनके मंदिर विडंबनाके कृत्य ही याद आते हैं, उसी प्रकार मठके संदर्भमें जो यह दुष्कृत्य किया गया है, उसे भी अनेक लोगोंद्वारा मठकी की गई विडंबना ही कहा जाएगा ।
प्रश्न : आप जब अन्यत्र यात्रा कर रहे थे, तब श्री बालास्वामी कांचीमें ही थे । ऐसा क्यों ?
शंकराचार्य : आरंभमें हम प्रथम कलवय्यी तथा तत्पश्चात तिरुपति एकसाथ गए थे । हमारे तिरुपति रहते चातुर्मास आरंभ हो गया था । उस समय उन्हें प्रतिदिन त्रिकाल पूजा करनी पडती थी । यात्रा करते हुए पूजा करना, सहज बात नहीं थी । अत: वे कांचीके मठमें जो श्रद्धालु आते हैं, उनसे भेंट करने हेतु मठमें ही रहे ।

७. अधिकोषसे हमारे खाते ‘सील’ करनेपर भी हमें आर्थिक कठिनाई नहीं हुई !

प्रश्न : मठकी आर्थिक स्थिती क्षीण हुई है, ऐसा कहा जाता है ।
शंकराचार्य : ऐसा कुछ नहीं । हमारे प्रतिदिनकी विधियों हेतु आवश्यक राशिपर कुछ परिणाम नहीं होगा, हमारे श्रद्धालु इसका प्रावधान रखते हैं । जब हमारे खाते ‘सील’ किए गए थे, उस समय भी हमें आर्थिक कठिनाई नहीं हुई थी । यह अपने लोगोंकी  उत्कट श्रद्धा है । आपको एक बात ध्यानमें रखनी आवश्यक है, कि ऐसे कई परिवार हैं, जो अनेक पीढियोंसे मठके श्रद्धालु हैं । मठके साथ उनके संबंध तथा श्रद्धा अटल हैं । किंतु एक बात ! हमारे अनेक नए उपक्रम कार्यान्वित करने हेतु हमें नए ढंगसे राशि इकट्ठा करना आवश्यक है ।

प्रश्न : यह संपूर्ण अनुभव एक शब्दमें व्यक्त करना हो, तो आप कैसे करेंगे ?
शंकराचार्य : `सत्य हेतु कालकी परीक्षा’ ।

८. स्वयंपर अन्याय होनेसे नहीं, अपितु उस कारण आपद्ग्रस्तोंकी सहायता न कर सकनेके कारण दुखी होनेवाले शंकराचार्य !

प्रश्न : ९ वर्ष पूर्वकी कालावधिमें क्या आपको एक बार भी ऐसा लगा कि यह घटना नहीं घटनी चाहिए थी ?

शंकराचार्य : केवल एक ही बार । वह भी जब आंध्रप्रदेश तथा देशके अन्य राज्योंपर त्सुनामी तूफानका प्रहार होनेसे प्रचुर हानि हुई । लातूर हो अथवा भुज, मैंने तथा मेरे श्रद्धालुओंने पीडितोंकी सहायता की थी । किंतु इस समय केवल मेरे भक्तोंने ही सहायताका कार्य किया, मैं व्यक्तिगत रूपसे वहां उपस्थित न रह सका । किंतु मेरा मन उन पीडितोंके पास ही था ।

धर्मपालन करो ! – शंकराचार्यका संदेश

प्रश्न : आपके श्रद्धालु तथा अन्य लोगोंको आप क्या संदेश देंगे ?
शंकराचार्य : मेरे श्रद्धालुओं हेतु मेरा अत्यंत सीधा-सादा संदेश है । नए उत्साहसे पुन: कार्यका आरंभ करें । महास्वामीकी इच्छा पूरी करें । हमें कोई भी नई योजना नहीं बनानी है । अच्छी बातें करनेपर ही बल दें । धर्मपालन करें । अन्य किसी बातकी चिंता न करें ।

कांची पीठ श्रद्धालुओंका सत्य तथा धर्मके प्रति समर्पण भावके कारण ही अबाधित !

कांची कामकोटि- २५०० वर्ष पूर्व आद्य शंकराचार्यने स्वयं यह पीठ स्थापित किया है । इससे पूर्व भी ऐसे संकट आ चुके हैं । युद्धके साथसाथ उसपर मनमानीका (प्रकृतिसे छेडछाडका) भी परिणाम हुआ है ।  इतने वर्षों पश्चात वह केवल उन आचार्योंके कारण, जिन्होंने आद्य शंकराचार्यका अनुकरण किया, उनके श्रद्धालुओंके कारण तथा श्रद्धालुओंके सत्य तथा धर्मके प्रति समर्पण भावके कारण ही अबाधित है । भगवान चंद्रमौळेश्वर तथा सुविख्यात  गुरुकी जो अखंड परंपरा कांची कामकोटि पीठको प्राप्त हुई है, उनके आशीर्वाद नित्य हमारे साथ रहेंगे ।

जो बीत गया, उसमें आप कोई परिवर्तन नहीं कर सकते !

भूतकालमें न रहें, उससे समयका अपव्यय होगा । जो बीत गया, उसमें आप परिवर्तन नहीं कर सकते । भविष्यमें अपने हेतु क्या रखा है, इसकी चिंता न करें । वह जगन्माता कामाक्षीके हाथोंमें है । सबकुछ ठीक हो जाएगा । सबकुछ त्रिपुरसुंदरीके साथ  चंद्रमौळेश्वरपर सौंपकर अपना कर्तव्य पूरा कर धर्मरक्षा करें । उसका फल क्या होगा इसकी चिंता भगवान करेंगे । ईश्वरेच्छा स्वीकारनेका औचित्त्य तथा धीरज रखें । अन्योंके लिए भी मेरा संदेश इससे अलग नहीं ।
सफलता प्राप्त करनेकी भागदौडमें, सत्य एवं धर्मका चिंतन-मनन करने हेतु एक क्षण रुकें । सभीको अपनी क्षमताकी पहचान हो, यही आशीर्वाद है ।

`जय जय शंकरा, हर हर शंकरा’ ।

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

 

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