वीर सावरकरजी पर सेमिनार : राजस्थान विश्वविद्यालय ने कार्यक्रम के लिए जगह देने से किया इनकार

राजस्थान की कांग्रेस सरकार का सावरकरद्वेष !

राजस्थान यूनिवर्सिटी ने इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) के उस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया जिसमें वीर सावरकर पर सेमीनार करने की अनुमति मांगी गई थी !

राजस्थान में कार्यभार संभालने के छह महीने के अंदर ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्ववाली कांग्रेस सरकार ने छात्रों के लिए स्कूल पाठ्य पुस्तकों में कई बदलाव किए ! इसमें एक बदलाव राजस्थान बोर्ड ऑफ सेकेंडरी कि, किताबों में किया गया, जिसमें वीर सावरकरजी के नाम के आगे से ‘वीर’ शब्द को हटा दिया गया है ! ऐसा कक्षा १२वीं की इतिहास की किताब में सावरकर की भूमिका में संशोधन कर किया गया।

राजस्थान यूनिवर्सिटी ने अब इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) के उस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया जिसमें वीर सावरकरजी पर सेमीनार करने की अनुमति मांगी गई थी। इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च भारत सरकारद्वारा वित्त पोषित एक स्वायत्त शैक्षणिक निकाय है !

कार्यक्रम आईसीएचआर नियोजित मल्टी-सिटी टॉक सीरीज का हिस्सा था, जिसके तहत सोमवार (११ नवंबर, २०१९) को ‘The truth about Savarkar’ लॉन्च किया गया। खास बात है कि, राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर इस कार्यक्रम के आयोजन की योजना बनाई गई। भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के जन्मदिन पर हर साल यह दिवस मनाया जाता है !

मामले में आईसीएचआर के अधिकारियों ने बताया, ‘टॉक सीरीज में मुख्य रूप से ‘स्वतंत्रता संग्राम के १८५७ के युद्ध पर सावरकर और उनके लेखन के बारे में झूठ का सामना’ पर केंद्रित होती। एक अंग्रेजी अखबार ने राजस्थान यूनिवर्सिटी के जरिए इसकी पुष्टि करते हुए कहा, ‘सावरकर के कुछ पहलु खासे विवादास्पद थे, जिसके चलते सेमिनार के लिए जगह के अनुरोध अस्वीकार कर दिया।’ सावरकर पर आईसीएचआर के अन्य सेमिनार जयपुर, गुवाहाटी, पोर्ट ब्लेयर, पुणे और कुछ अन्य शहरों में आयोजित किए जाने थे।

Rajasthan University declines permission to Indian Council of Historical Research for a seminar on Veer Savarkar

जानना चाहिए कि, इससे पहले वीर सावरकरजी से जुडे पाठ्यक्रम में जो बदलाव किए गए उन नई किताबों में अब वीर सावरक का नाम ‘विनायक दामोदर सावरकर’ है ! जिसमे लिखा गया है कि, कैसे जेल में बंद होने के दौरान सावरकर ने अंग्रेजों को चार बार दया याचिका के लिए पत्र लिखा। यही नहीं दूसरी दया याचिका में उन्होंने खुद को पुर्तगाली बताया और साावरकर ने भारत को हिंदू देश बनाने की दिशा में काम किया। इस किताबों में यह भी लिखा है कि, सावरकर ने १९४२ में भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया !

स्त्रोत : जनसत्ता

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