कुंभपर्वक्षेत्र प्रयाग की महिमा

यह उत्तरप्रदेशमें गंगा, यमुना एवं सरस्वतीके पवित्र ‘त्रिवेणी संगम’पर बसा तीर्थस्थान है । गंगा एवं यमुना नदी दिखाई देती हैं; परंतु सरस्वती नदी अदृश्य है । इस पवित्र संगमके कारण ही इसे ‘प्रयागराज’ अथवा ‘तीर्थराज’ कहा जाता है ।

१. व्युत्पत्ति एवं अर्थ

प्रयाग शब्द ‘प्र’ उपसर्गपूर्वक ‘यज्’ इस धातुसे बना है । इसका अर्थ है ‘बडा यज्ञ करना’ । ‘प्रयाग’ यह नाम अर्थपूर्ण एवं वेदोंके समान प्राचीन है, इसलिए श्रद्धालु इस क्षेत्रको विदेशी आक्रमणकारियोंद्वारा दिए ‘इलाहाबाद’ नामकी अपेक्षा ‘प्रयाग’ नामसे ही संबोधित करें ।

२. क्षेत्रमहिमा

२ अ. प्रजापतिक्षेत्र

खोए हुए चारों वेद पुनः मिलनेपर प्रजापतिने यहां एक महायज्ञ किया था; अतः प्रयागको ‘प्रजापतिक्षेत्र’ भी कहा जाता है ।

२ आ. पांच यज्ञवेदियोंकी मध्यवेदी

ब्रह्मदेवकी, कुरुक्षेत्र, गया, विराज, पुष्कर एवं प्रयाग इन पांच यज्ञवेदियोंमेंसे प्रयाग मध्यवेदी है ।

२ इ. त्रिस्थली यात्रामेंसे एक

काशी, प्रयाग एवं गया इस त्रिस्थली यात्रामें एक प्रयागका स्थान धार्मिक दृष्टिसे अद्वितीय है ।

२ ई. प्रलयकालमें सुरक्षित रहनेवाला क्षेत्र

इस क्षेत्रका माहात्म्य बताते हुए कहा गया है कि महाप्रलयके समय संपूर्ण विश्व डूब जाए, तब भी प्रयाग नहीं डूबेगा । ऐसा गया है कि प्रलयके अंतमें श्रीविष्णु यहांके अक्षयवटपर शिशुरूपमें शयन करेंगे । इसी प्रकार सर्व देव, ऋषि एवं सिद्ध यहां वास कर इस क्षेत्रकी रक्षा करेंगे ।

२ उ.    विविध धर्मग्रंथोंमें वर्णित माहात्म्य

२ उ १. ऋग्वेद : ऋग्वेदके खिलसूक्तमें कहा गया है –

सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।

ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं भजन्ते ।।

– ऋग्वेद, खिलसूक्त

अर्थ : जहां गंगा-यमुना दोनों नदियां एक होती हैं, वहां स्नान करनेवालोंको स्वर्ग मिलता है एवं जो धीर पुरुष इस संगममें तनुत्याग करते हैं, उन्हें मोक्षप्राप्ति होती है ।

२ उ २.  पद्मपुराण : प्रयागराज तीर्थक्षेत्रके विषयमें पद्मपुराणमें कहा गया है –

ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी ।

तीर्थानामुत्तमं तीर्थं प्रयागाख्यमनुत्तमम् ।।

अर्थ : जिस प्रकार ग्रहोंमें सूर्य एवं नक्षत्रोंमें चंद्रमा श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सर्व तीर्थोंमें प्रयागराज सर्वोत्तम हैं ।

२ उ ३.    कूर्मपुराण : कूर्मपुराणमें कहा गया है कि प्रयाग तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है ।

२ उ ४.    महाभारत

प्रयागः सर्वतीर्थेभ्यः प्रभवत्यधिकं विभो ।।

श्रवणात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि ।

मृत्तिकालम्भनाद्वापि नरः पापात् प्रमुच्यते ।।

– महाभारत, पर्व ३, अध्याय ८३, श्लोक ७४, ७५

अर्थ : हे राजन्, प्रयाग सर्व तीर्थोंमें श्रेष्ठ है । उसका माहात्म्य श्रवण करनेसे, नामसंकीर्तन करनेसे अथवा वहांकी मिट्टीका शरीरपर लेप करनेसे मनुष्य पापमुक्त होता है ।

३. तीर्थक्षेत्रकी विधि

प्रयागराजकी तीर्थयात्रा करते समय त्रिवेणीसंगम का पूजन, केशमुंडन, गंगास्नान, पितृश्राद्ध, सुहागिन स्त्रियोंद्वारा वेणीदान एवं देवताओंके दर्शन करना आदि आवश्यक विधियां करनी होती हैं ।

४. स्थानदर्शन

प्रयागके स्थानदर्शन करनेके विषयमें एक श्लोकमें कहा गया है –

त्रिवेणीं माधवं सोमं भरद्वाजं च वासुकिम् ।

वन्देऽक्षयवटं शेषं प्रयागं तीर्थनायकम् ।।

अर्थ : त्रिवेणी (संगम), वेणीमाधव, सोमेश्वर, भारद्वाज, वासुकी नाग, अक्षयवट, शेष (बलदेव) एवं तीर्थराज प्रयागको मैं वंदन करता हूं ।

४ अ. त्रिवेणी संगम

संगमस्थलमें गंगा-यमुना-सरस्वती, इन तीन नदियोंके प्रवाह चोटीकी लटोंके समान आपसमें गुथे हुए हैं ।

४ आ. माधव

यहां माधवक्षेत्र है, उसमें वेणीमाधव (प्रमुख माधव), शंखमाधव, मनोहरमाधव आदि १२ माधव हैं ।

४ इ. सोमेश्वर

यमुनाके पार अरैल गांवमें बिंदुमाधव क्षेत्रके निकट यह शिवमंदिर है ।

४ ई. भारद्वाज एवं शेष

यहां भारद्वाज मुनिका आश्रम है । इस आश्रमके शिवलिंगको ‘भारद्वाजेश्वर’ कहते हैं । इस देवालयमें सहस्र फनोंवालीr शेषर्मूित है ।

४ उ. वासुकीश्वर

यहां गंगातटपर (बक्षी पेठमें) वासुकीका मंदिर है ।

४ ऊ. अक्षयवट

यह प्राचीन एवं पवित्र वटवृक्ष प्रयागमें यमुनातटपर है । वायु, मत्स्य, कूर्म, पद्म, अग्नि एवं स्कंद पुराणोंमें कहा गया है, ‘अक्षयवटके निकट देहत्याग करनेसे मोक्ष प्राप्त होता है ।’

४ ऊ १. हिंदुओंको मोक्ष प्राप्त न हो, इसलिए प्रयागस्थित अक्षयवट नष्ट कर किला बनानेवाला हिंदूद्वेषी अकबर एवं अकबरपुत्र जहांगीर !

सत्रहवीं शताब्दीके आरंभमें मुगल बादशाह अकबरने प्रयागमें यमुनातटपर सुरक्षा हेतु किला बनानेका कारण बताकर अक्षयवट एवं उस परिसरके देवालयोंको नष्ट किया । जहां अक्षयवट था, वहां उसने किलेमें ‘रानीमहल’ बनवाया । कुछ समय पश्चात वहां पुनः अक्षयवट उग आया । तब अकबरपुत्र जहांगीरने अनेक बार उसे जलाकर नष्ट करनेका प्रयत्न किया । जहांगीरने उष्ण तवा रखकर उस वृक्षको जडसहित नष्ट करनेका भी प्रयास किया; परंतु प्रत्येक बार इस अक्षयवटमें नई कोंपलें निकलतीं एवं आगे वे वृक्षका रूप धारण करतीं । वर्ष १६९३ में ‘खुलासत उत्वारीख’ ग्रंथमें प्रमाण है, ‘जहांगीरके अक्षयवट काटनेपर भी वह पुनः उग आया ।’

आज भी यमुना नदीके किनारे अकबरके किलेमें यह प्राचीन वृक्ष खडा है । हिंदुओंको मोक्ष न मिले, इस उद्देश्यसे मुगल बादशाहोंने उसके दर्शन करनेपर प्रतिबंध लगाया । आगे अंग्रेजोंने यह प्रतिबंध जारी रखा एवं आज भी स्वतंत्र भारतमें हिंदुओंका उस किलेमें जाना एवं अक्षयवटके दर्शन करना प्रतिबंधित है । इस अक्षयवटका दर्शन करनेकी इच्छा रखनेवाले श्रद्धालुओंको किलेमें स्थित वृक्षका तना दूरसे ही दिखाया जाता है ।

वर्ष २००१ में कुंभमेलेके समय ‘श्रद्धालु किलेमें प्रवेश कर अक्षयवटका दर्शन कर पाएं’ इस हेतु ‘विश्व हिंदू परिषद’ने पहल की थी ।

अब ‘प्रयागक्षेत्रमें स्थित किलेमें जाकर सदैव इस अक्षयवटके दर्शन कर पाएं’ इस हेतु सर्व हिंदुत्ववादियोंको पहल करनेकीr आवश्यकता है !

५. कुंभमेला

५ अ. महाकुंभमेला

यहां गंगा, यमुना तथा सरस्वतीके त्रिवेणी संगमपर प्रत्येक १२ वर्षमें कुंभमेलेका आयोजन होता है, जिसे ‘महाकुंभमेला’ भी कहते हैं ।

इस कुंभपर्वमें मकर संक्रांति, माघ अमावस्या एवं वसंतपंचमी, ये तीन उपपर्व पडते हैं । इनमें ‘अमावस्या’ प्रमुख पर्व है तथा इसे ‘पूर्णकुंभ’ कहते हैं । माघी पूर्णिमाको ‘पर्वकाल’ माना जाता है । इन चार पर्वोंपर गंगास्नानका विशेष महत्त्व है । इस दिन प्रयागतीर्थमें स्नान करनेपर १ सहस्र अश्वमेध यज्ञ, १०० वाजपेय यज्ञ तथा पृथ्वीकी १ लाख परिक्रमा करनेका पुण्य मिलता है । एक कुंभस्नानका फल है – १ सहस्र कार्तिक स्नान, १०० माघ स्नान एवं नर्मदाके १ कोटि वैशाख स्नान ।

५ आ. माघमेला एवं अर्धकुंभमेला

इस पवित्र त्रिवेणी संगमपर प्रतिवर्ष माघ मासमें मेला लगता है । इसे ‘माघमेला’ कहा जाता है । माघ मासकी अमावस्याके दिन संन्यासीजनोंका विशाल समुदाय स्नान करने हेतु जुटता है । प्रत्येक ६ वर्षमें लगनेवाले माघमेलेको ‘अर्धकुंभमेला’ कहा जाता है ।

५ इ. कल्पवास : कुंभपर्वकी एक साधना !

माघ मासमें प्रयागके संगम स्थानपर अथवा कुंभपर्वमें अनेक व्यक्ति ‘कल्पवास’ करते हैं अर्थात गंगातटपर रहते हैं तथा मासकी समाप्तिपर घर लौटते समय कुटि दान करते हैं ।

ऐसी श्रद्धा है कि कल्पवाससे सभी पाप धुल जाते हैं । कुंभपर्वमें कल्पवासी मन-मस्तिष्कसे प्रभुके प्रति समर्पित करनेके भावसे ‘मुंडन संस्कार’ करते हैं तथा उपवास रखते हैं ।

५ ई. प्रयागवाल : कुंभपर्व अंतर्गत विधियोंके पुरोहित !

इन्हें त्रिवेणी तट एवं जलपर दान-दक्षिणा ग्रहण करना, पूजाविधि करना तथा कुंभमेलेका आयोजन करना, ऐसे अधिकार होते हैं । कुंभमेलेमें कल्पवासियोंकी भी वे व्यवस्था करते हैं । यह परंपरा प्राचीन है तथा ‘मत्स्यपुराण’में इसका विषद् वर्णन है । अस्थिप्रवाहका पूजाकार्य भी इन्हीं प्रयागवालोंद्वारा संपादित किया जाता है ।

(संदर्भ – सनातनका ग्रंथ – कुंभमेलेकी महिमा एवं पवित्रताकी रक्षा)