शनिशिंगणापूर

शनिशिंगणापूर के श्री शनैश्‍वरजी के चबुतरेपर चढकर महिलाने किया दर्शन !

शनिशिंगणापूर (नगर) के प्रसिद्ध जागृत एवं स्वयंभू श्री शनैश्‍वरजी के चबुतरेपर चढकर २८ नवंबर के दिन एक महिलाने श्री शनैश्‍वर का दर्शन किया । गत कुछ वर्षोंसे पुरूषों को भी शनि के चबुतरेपर जाकर दर्शन करने प्रतिबंध डाला गया है । महिलाआें के लिए यह प्रतिबंध पहलेसे ही लागू था । देशभर के अनेक मंदिरों में भी धर्मशास्रद्वारा बताए गए, साथ ही पूर्वापार से चलते आए हुए मंदिर प्रवेश के संदर्भ में नियम हैं । उनका पालन करने में ही सब का हित होता है; परंतु कथित पुरोगामी स्रीमुक्ति के ढोल बजानेवाले इन परंपरा को तोडने का मन बना रहे हैं । तमिलनाडू में होनेवाले शनि के मंदिर के उपरसे अमेरिका का उपग्रह नहीं जा सकता, ऐसा ३ बार सिद्ध होने के कारण अमेरिकाने अपने मार्ग में अब परिवर्तन किया हैे, ऐसा समाचार प्रकाशित हुआ था । क्या इसका उत्तर बुद्धीवादी दे सकते हैं ? धर्म के संदर्भ में स्री-पुरूष समानता के सूत्र उपस्थित करना हास्यास्पद है । देवस्थान अथवा गर्भगृह में होनेवाली ऊर्जा का महिलाआें के शरिरपर अनिष्ट परिणाम न हो; इसलिए कुछ मंदिरों में मूर्ति के समीप अथवा गर्भगृह में उनके लिए प्रवेश नहीं होता है । यहां धर्मने एक प्रकारसे महिलाआें के स्वास्थ्य की चिंता ही की है, यह कथित बुद्धीवादी एवं स्त्रीवादी इनके ध्यान में नहीं आता ।

२६ जनवरी को भूमाता ब्रिगेड की ओरसे कथित स्रीमुक्ति का बवंडर मचाकर धार्मिक जनता, साथ ही स्थानीय नागरिक इनके विरोध को भी ध्यान में लेते हुए शनि के चबुतरेपर चढने का आततायीपन किया जानेवाला है । किंतु शनिशिंगणापूर में धार्मिक प्रथाआें को तोडने इच्छुक नास्तिकवादियों के प्रयास को हम तोड देंगे, साथ ही इस प्रकार की घटनाएं भविष्य में ना हों, इसलिए हिन्दु धार्मिक परंपरा रक्षा आंदोलन व्यापक स्तरपर करेंगे, ऐसा निश्‍चय नगर के हिन्दुत्वनिष्ठोंने व्यक्त किया है ।

श्री. संदीप खामकर ने भी २६ जनवरी के दिन भूमाता ब्रिगेड की ओरसे किए जानेवाले धर्मविरोधी कृति के संदर्भ में स्थानियों में जागृति की है तथा उन्होंने हम अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर उनके इस उपक्रम को सफल नहीं होने देंगे, ऐसी चेतावनी दी ।

हिन्दू धार्मिक परंपरा रक्षा अभियान

२६ जनवरी को चलो शनिशिंगणापूर

कथित पुरोगामी एवं नास्तिकवादी इनके विरूद्ध हिंदूआें की धार्मिक परंपराएं एवं प्रथाएं इनकी रक्षा हेतु अभियान हाथ में लिया गया है । इसके अंतर्गत २६ जनवरी को भूमाता ब्रिगेड के चबुतरेपर चढने के प्रयास को निष्फल बनाने के लिए सभी धार्मिक एवं हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों के कार्यकर्ता शनिशिंगणापूर देवस्थान की रक्षा करनेवाले हैं, साथही उसके चारों ओर सुरक्षाकवच बनानेवाले हैं । इस अभियान के लिए गांव की महिलाआें के समेत महाराष्ट्र से बडी मात्रा में शनिभक्त उपस्थित रहनेवाले हैं । इसलिए अधिकाधिक महिलाएं तथा शनिभक्त इस अभियान में सहभागी हों, ऐसा आह्वान समिति की ओरसे किया गया है ।
जो इस अभियान में सहभागी होना चाहते हैं, उन शनिभक्त एवं धर्माभिमानी हिन्दू, हिन्दू जनजागृति समिति के राज्य संगठक श्री. सुनील घनवट से ९४०४९५६५३४ इस क्रमांकपर संपर्क करें, ऐसा आह्वान समितिने किया है ।

शनिशिंगणापूर के शनिदेव के चबुतरेपर महिलाआें को प्रवेश करने के लिए प्रतिबंध क्यों ?

महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध शनिशिंगणापूर देवस्थान अंतर्गत शनिदेव के चबुतरेपर महिलाआें को प्रवेश के लिए प्रतिबंध होते हुए भी एक महिलाने चबुतरेपर चढकर शनिदेव को तेलार्पण किया । इस घटना के संदर्भ में एबीपी माझा, आयबीएन् लोकमत इत्यादी समाचार प्रणाल एवं अन्य माध्यम इनमें स्त्रीमुक्ती, पुरषसत्ताक संस्कृति, मंदिरसंस्कृति का प्रतिगामीपन, पुरानी विचारधारा आदी दृष्टिकोण को लेकर चर्चा चालू है । यह विषय धार्मिक दृष्टिसे अधिक महत्त्वपूर्ण होने के कारण यहांपर सनातन का दृष्टिकोण दिया है ।

१. शनिशिंगणापूर में शनिदेव की स्वयंभू मूर्ती एक चबुतरेपर खडी है । मंदिर प्रबंधन ने कुछ वर्ष पूर्व ही चबुतरेपर चढकर शनिदेव को तेलार्पण करनेपर प्रतिबंध डाला था । इसलिए आज आए दिन सभी जाति-धर्म के स्री-पुरूष श्री शनिदेव का दर्शन दूरसे ही करते हैं । इसलिए वहां मात्र महिलाआेंपर ही प्रतिबंध है, ऐसा कहना अनुचित है ।

२. अध्यात्मशास्र के अनुसार प्रत्येक देवता का कार्य निर्धारित होता है । उस कार्य के अनुसार संबंधित देवता की प्रकटशक्ति कार्यरत होती है । शनिदेवता उग्रदेवता होने के कारण उसमें होनेवाली प्रकटशक्ति के कारण महिलाआें को कष्ट होने की संभावना होती है । शनिशिंगणापूर में ४००-५०० वर्ष पूर्व शनिदेव का मंदिर बना । तबसे लेकर वहां महिलाआें के लिए चबुतरे के नीचेसे दर्शन करने की परंपरा है ।

३. अशौच होते समय, साथ ही चमडी की वस्तूएं (घडी का पट्टा, कमर का पट्टा) आदी परिधान किए हुए पुरूषों के लिए भी शनिदेव के चबुतरेपर प्रवेश करने के लिए प्रतिबंध है । इतनाही नहीं, अपितु पुरूषों को चबुतरेपर चढने के पूर्व स्नान के द्वारा शरिरशुद्धी करना, साथ ही केवल श्‍वेतवस्र ही परिधान करना आवश्यक होतो है । इन नियमों का पालन करनेवालों को ही मात्र शनिदेव के चबुतरेपर प्रवेश है ।

४. हिन्दु धर्म में कुछ देवताआें की उपासना कुछ विशिष्ट कारणों के लिए ही की जाती है । शनिदेव उन देवताआें में से एक हैं । विशिष्ट ग्रहदशा, उदा. साढेसाती आदी काल में उनकी उपासना की जाती है । यह सकाम साधना होने के कारण सकाम साधना करनेवाले को उस साधनासे संबंधित नियमों का पालन करनेसे मात्र ही उसका फल प्राप्त होता है । हमने यदि मनगंढत नियम बनाए, तो उसमेंसे केवल मानसिक संतोष होगा; परंतु आध्यात्मिक लाभ नहीं होगा ।

५. यह विषय स्त्रीमुक्ति का न होकर वह पूर्णरूपसे आध्यात्मिक स्तर का है । इसलिए उसकी चिकित्सा सामाजिक दृष्टिकोण से, साथ ही धर्म का अध्ययन न होनेवालों से करना अनुचित हो । किसी विषय के विशेषज्ञने ही उस विषयपर बात करनी चाहिए । किसी विधिज्ञ के लिए किसी रोगी को औषधि देना जिस प्रकार अयोग्य होगा, उसी प्रकार इस विषयपर सामाजिक कार्यकर्ताआें को दूरचित्रवाणी प्रणालोंपर चर्चा करना योग्य नहीं होता ।

६. शनिदेव के चबुतरेपर महिलाआें के प्रवेश मिले, इसलिए स्रीमुक्ति का आक्रोश करनेवाले धर्मद्रोही मस्जिदों में महिलाआें को प्रवेश मिले; इसलिए क्यों नहीं चिल्लाते ?

श्री. चेतन राजहंस, प्रवक्ता, सनातन संस्था

 

बुद्धीप्रमाणतावादी पत्रकारोंद्वारा अनावश्यक विरोधी प्रश्‍न

पत्रकार सम्मेलन के समय कुछ बुद्धीप्रमाणतावादी पत्रकारोंद्वारा श्री शनिदेव का दर्शन करनेसे महिलाआें को कष्ट हो सकता है, इसके वैज्ञानिक प्रमाण दिजिए, इस प्रकार के अनावश्यक प्रश्‍न उपस्थित किए जा रहे थे । पत्रकारों की शंकाआें का निवारण करने का प्रयास कर भी अयोग्य प्रथाआें को छेद देकर परिवर्तन करने की हिन्दु धर्म की परंपरा है । इस प्रकार के वक्तव्य कर अध्यात्मशास्र एवं धर्मशास्र इनको जान लेने में रूचि नहीं दिखाई । (दोनों बाजूआें को जान लेकर समाजतक उसमें की योग्य बाजू पहुंचाने का दायित्व पत्रकारों का है । किसी भी अध्ययन के बिना अपने मन में एक बाजू निश्‍चित कर मात्र विरोध के लिए विरोध करनेवाले पत्रकार समाज का योग्य दिशादर्शन क्या करेंगे ?  संपादक, दैनिक सनातन प्रभात)

प्रश्‍न : शनिदेव उग्र होने के कारण इस देवता के दर्शन के कारण महिलाआें की गोदपेटपर प्रतिकूल परिणाम होने का वैद्यकीय दृष्टिसे सिद्ध हुआ है क्या ? यह हमें आपका प्रसिद्धी प्राप्त करने के लिए बनाया हुआ स्टंट लगता है ।

उत्तर : प्रत्येक बात को वैद्यकीय दृष्टिसे सिद्ध नहीं किया जा सकता । विज्ञान के नियम अध्यात्म के लिए लागू नहीं होते । अध्यात्मशास्र अनुभूति का शास्र है । अध्यात्म के नियमों को समझ लेने के लिए उसके लिए पात्र होना पडता है, अर्थात् उसके लिए साधना करना आवश्यक है । जिसकी जैसी आस्था होती है, उसे उस प्रकार का फल प्राप्त होता है, ऐसा गुरुचरित्र में बताया गया है । ऋषिमुनियोंने  सैंकडो वर्ष पूर्व किये गए नियम चूक नहीं हो सकते ।

हमे प्रसिद्धी प्राप्त करने के लिए स्टंट करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है । प्रथा-परंपराआें को तोडने के संदर्भ में पहले पुरोगामियोंने ही घोषित किया । इसीलिए हमे अपनी धार्मिक परंपराआें की रक्षा करने हेतु अभियान चलाना पडा । इसके लिए हमने पुलीस एवं प्रशासन इनको ज्ञापन दिया है । हिन्दू सहिष्णु हैं; इसलिए कोई भी उठे तथा हिन्दूआें की प्रथाएं एवं परंपराआें को तोडने का प्रयास करे, यह सहन नहीं किया जाएगा ।

प्रश्‍न : पुरोगामी महिलाआें को रोकने के लिए आप बल का उपयोग करेंगे क्या ?

उत्तर : हिन्दु जनजागृति समिति के सभी उपक्रम सनदशीर पद्धतिसे होते हैं । उसी प्रकार शनिशिंगणापूर में भी सनदशीर पद्धतिसे ही हिन्दु धार्मिक प्रथाएं-परंपराआें की रक्षा का आंदोलन चलाया जानेवाला है । यदि किसी स्थानपर आततायीपन होने का दिखाई दिया, तो हम उसको पुलीस की ध्यान में लाकर देंगे ।

प्रश्‍न : अयोग्य परंपराआें को छेदकर सुधार करने की हिन्दु धर्म की परंपरा है । उसके अनुसार यहां भी अयोग्य प्रथाएं बंद नहीं करनी चाहिएं क्या ?

उत्तर : देवतादर्शन एवं चबुतरा इनका पावित्र्य अविच्छिन्न रखना यह कर्मकांड का भाग है । कर्मकांड में होनेवाली क्रियाआें के लिए होनेवाले नियमों का पालन करना ही होगा ।

प्रश्‍न : महिलाआें को चबुतरेपर प्रवेश देनेसे देवता को कुछ नहीं होगा । आप के कहने के अनुसार उसका परिणाम पुरोगामी महिलाआेंपर ही होनेवाला है । तो क्या आप उनकी रक्षा हेतु अभियान चला रहे हैं ?

उत्तर : यह अभियान देवता अथवा पुरोगामी महिला इनकी रक्षा के लिए नहीं, अपितु धार्मिक प्रथाएं-परंपराएं इनकी रक्षा हो; इसलिए चलाया जा रहा है ।



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