शबरीमला के अय्यप्पा मंदिर की प्रथा-परंपराआें का सम्मान करें !

केरल में शबरीमला के अय्यप्पा मंदिर में सभी महिलाआें को प्रवेश देने का निर्णय उच्चतम न्यायालय ने २८ सितंबर २०१८ को दिया । इस निर्णय के विरुद्ध भगवान अय्यप्पा की लाखों महिला और पुरुष भक्तों ने मंदिर की परंपरा की रक्षा के लिए वैधानिक और शांतिपूर्ण ढंग से विशाल प्रदर्शनों, आंदोलनों आदि के माध्यम से विरोध किया । इन आंदोलनकारी भक्तों में से ३ सहस्त्र ५०० से अधिक भक्तों को केरल पुलिस ने बंदी बनाकर उनके विरुद्ध आपराधिक अभियोग पंजीकृत किया है । वैधानिक मार्ग से आंदोलन करनेवाले भक्तों के साथ ऐसा व्यवहार करना, दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है । हिन्दुआें की धार्मिक परंपरा के विषय में निर्णय देते समय उच्चतम न्यायालय को लाखों भक्तों की भावनाआें का विचार करना चाहिए था ।

शबरीमला के अय्यप्पा मंदिर में प्रवेश के लिए धार्मिक परंपरा पर किया गया आघात !

  • २० अक्टूबर २०१८- भाग्यनगर निवासी मोजो टी.वी. की महिला पत्रकार कविता जक्कल और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्त्री रेहाना फातिमा ने मंदिर में जाने का प्रयत्न किया ।
  • २१ अक्टूबर २०१८ – पिछडावर्ग संगठन की पदाधिकारी एस.पी. मंजू (३८ वर्ष), मेरी स्विटी (४६ वर्ष) ने मंदिर में प्रवेश करने का प्रयत्न किया ।
  • २२ अक्टूबर २०१८ – बिंदु थँक कल्याणी ने मंदिर में प्रवेश करने का प्रयत्न किया ।
  • २३ अक्टूबर २०१८ – ‘मानिथी’ संगठन की प्रमुख सेलवी और इस संगठन की ३० महिलाआें ने मंदिर में प्रवेश करने की घोषणा की ।
  • २ जनवरी २०१९ – केरल की हिन्दूद्वेषी साम्यवादी सरकार के समर्थन से बिंदु (४२ वर्ष) और कनकदुर्गा (४४ वर्ष) नाम की महिलाआें ने शबरीमला के अय्यप्पा स्वामी मंदिर में घुसकर अपना नाम चमकाने के लिए सैकडों वर्षों की हिन्दू धर्मपरंपरा को रौंद दिया !

हिन्दुआें के मंदिर में जाने के लिए मुसलमान और ईसाई महिलाआें का आंदोलन कर कानून-व्यवस्था को बंधक बनाना, अत्यंत गंभीर तथा जानबूझकर दंगा जैसी परिस्थिति उत्पन्न करने के लिए रचा गया षड्यंत्र है ।

हिन्दुओ, धर्मशास्त्र समझकर वह अपने हिन्दू भाइयों को बताएं !

१. मंदिर, ईश्‍वरीय चैतन्य और सात्त्विकता के स्रोत होते हैं । मासिकधर्म की अवस्था में स्त्रियों में रजोगुण बढ जाता है । इस अवस्था में यदि स्त्रियां मंदिर जैसे सात्त्विकता, ऊर्जा और शक्ति के स्रोतवाले स्थान में जाएंगी, तो उनके पेट में कष्ट हो सकता है । मंदिर की सात्त्विकता न सह पाने के कारण भी उन्हें कष्ट हो सकता है

२. शबरीमला के अय्यप्पा भगवान ब्रह्मचारी हैं । इसलिए इनके मंदिर के गर्भगृह में शक्ति अधिक रहती है । इस शक्ति के प्रभाव में बार-बार आने से महिलाआें की प्राकृतिक सृजनशीलता में विकार उत्पन्न हो सकता है । इसलिए, महिलाआें का विचार कर, हिन्दू धर्मशास्त्रकारों ने कुछ नियम बनाए हैं, यह बात सबको समझनी चाहिए ।

३. हिन्दू धर्म में ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग आदि ईश्‍वरप्राप्ति के अनेक मार्ग बताए गए हैं । इन मार्गों में एक, कर्मकांडानुसार साधना भी है । जिस साधनामार्ग को हम अपनाते हैं, उसके नियमों का पालन करना हमारा आवश्यक कर्तव्य होता है । इन नियमों का पालन करने से व्यक्ति को साधना अथवा उपासना करने समान लाभ होता है । मंदिर हिन्दुआें के चैतन्यदायी केंद्र हैं । इनमें, धर्मशास्त्रानुसार धार्मिक कृत्य करने पर मंदिर का ईश्‍वरीय चैतन्य और सात्त्विकता सुरक्षित रहती है और बढती भी है । व्यवहार में भी हम देखते हैं कि शल्यकर्म कक्ष में सबको नहीं जाने दिया जाता और कक्ष के बाहर जूते-चप्पल निकालने पडते हैं । जिस प्रकार चिकित्सकों को मुखपर मास्क, सिर पर टोपी, एप्रन आदि पहनकर शल्यकर्म-कक्ष में प्रवेश करना पडता है, वहां कोई इन नियमों का विरोध नहीं करता; उसी प्रकार, मंदिर में भी प्रवेश के कुछ नियम शुचिता की दृष्टि से बनाए गए हैं, जिनका पालन सबको करना चाहिए ।

४. शबरीमला मंदिर में प्रवेश के पहले ४१ दिन का अखंड व्रत करना पडता है । व्रत, कर्मकांड के अंतर्गत साधना है । इसलिए, इसके नियमों का पालन करने से लाभ मिलता है । मासिकधर्म की अवस्था में यह व्रत नहीं किया जा सकता । इसलिए, १० से ५० वर्ष की महिलाएं ४१ दिन का यह व्रत नहीं करतीं ।

५. मंदिर में रजोगुण बढने से वहां का सत्त्वगुण घट सकता है । मंदिर की सात्त्विकता से संपूर्ण समाज को लाभ होता है । इसलिए, उसकी सात्त्विकता सुरक्षित रखना समाज के सब वर्गों का कर्तव्य है । मंदिर की सात्त्विकता घटने पर सबकी हानि हो सकती है । यह धर्म का व्यापक विचार है ।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि धर्मनियम महिलाआें के हित में ही है !

शबरीमला मंदिर का विशेष धर्मशास्त्र समझें !

१. शबरीमला की यह परंपरा, सनातन वैदिक धर्म का अंग है । (भगवान अय्यप्पा) शबरीमला मंदिर के ‘शासक’ हैं और वे ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते हैं । देश के अन्य भगवान अय्यप्पा के मंदिरों से शबरीमला का अय्यप्पा मंदिर भिन्न है । अन्य मंदिरों में स्थित भगवान अय्यप्पा ‘धर्मशासक’ के रूप में पूजे जाते हैं ।

२. केरल में भगवान अय्यप्पा के ४ प्रमुख मंदिर हैं । उनमें, भगवान अय्यप्पा के ४ रूप हैं । कुलातुपुळा में बाल, शबरीमला में ब्रह्मचारी, अचनकोविल में पत्नी के साथ और आर्यानकोवू में संन्यासी रूप में भगवान अय्यप्पा प्रतिष्ठित हैं । जहां भगवान अय्यप्पा ब्रह्मचारी के रूप में प्रतिष्ठित हैं, उस शबरीमला को छोडकर शेष तीनों मंदिरों में तथा विश्‍व के अन्य अय्यप्पा मंदिरों में भी महिलाआें के प्रवेश पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है ।

३. शबरीमला के मंदिर में भी केवल १० से ५० वर्ष की महिलाआें को प्रवेश की अनुमति नहीं है । इसलिए, इस मंदिर में महिलाआें को प्रवेश की अनुमति नहीं है, यह दुष्प्रचार करना अनुचित है ।

४. भारत के अन्य सहस्त्रों मंदिरों में ऐसा नियम नहीं है । यह नियम केवल इस विशेष मंदिर के लिए है । इस नियम का पालन करने में क्या अडचन है ? इस मंदिर में जिन महिलाआें को प्रवेश की अनुमति नहीं है, वे भगवान अय्यप्पा के अन्य मंदिरों में जाकर दर्शन कर सकते हैं ।

इस प्रकरण में मान्यवरों के विचार –

१. शबरीमला मंदिर, भगवान श्री अय्यप्पा का निवास है; अश्‍लीलता का स्थान नहीं ! – प्रयार गोपालकृष्णन्, त्रावणकोर देवस्वम् मंडल’ के पूर्व अध्यक्ष

२. शबरीमला मंदिर की ओर न केवल हिन्दू, अपितु दूसरे धर्म के लोग भी जा रहे हैं । इसलिए, सब लोग चिंतित हैं । रेहाना फातिमा को सुरक्षा में ले जाते समय उन्हें पुलिस का गणवेश पहनाया गया था । यह पूर्णतः अनुचित है । – कांग्रेस नेता, आर.आर. चेन्नीथा

३. प्रत्येक मंदिर की कुछ प्राचीन प्रथा-परंपराएं होती हैं । अनंत काल से श्रद्धालु जन उनका अतीव श्रद्धा से पालन कर रहे हैं । इसलिए, उन प्रथा-परंपराआें के पालन में किसी प्रकार की बाधा न डाली जाए, यह मेरी नम्र सूचना है । – रजनीकांत, सुप्रसिद्ध अभिनेता

हिन्दुओ, हिन्दूद्वेषी स्त्री-मुक्तिवादियों और तथाकथित आधुनिकतावादियों से यह कहिए –

१. पिछले कुछ वर्षों से हिन्दुआें के धार्मिक कृत्य, मंदिर, प्रथा-परंपरा आदि पर आघात करने के लिए तथाकथित आधुनिकतावादी लोग स्त्री-पुरुष समानता के नाम पर जानबूझकर लैंगिक भेदभाव का रंग देकर, समाज को भ्रमित कर रहे हैं । वास्तविक, धार्मिक परंपरा और लिंगभेद का आपस में कोई संबंध नहीं है ।

२. समानता का ढोल पीटनेवाले बताएं कि क्या पुरुष बच्चे को जन्म दे सकता है ? स्त्री-पुरुषों में शारीरिक, मानसिक भेद प्राकृतिकरूप से ही हैं और सदा रहेंगे ।

३. हमारे हाथ की सब उंगलियां भी एक जैसी नहीं होतीं । विश्‍व का एक भी व्यक्ति दूसरे जैसा नहीं होता । प्रकृति में भी असमानता है । पेड, प्राणी सब एक-दूसरे से भिन्न होते हैं । ऐसी स्थिति में स्त्री-पुरुष समानता की बात करना अत्यंत हास्यास्पद और बचपना नहीं है क्या ?

४. रेलगाडी में महिलाआें के लिए अलग डिब्बा रहता है । बस में कुछ स्थान महिलाआें के लिए आरक्षित रहते हैं । चुनावों में भी महिलाआें के लिए कुछ स्थान आरक्षित रहते हैं । इतना ही नहीं, सार्वजनिक शौचालयों में भी स्त्रियों और पुरुषों के लिए अलग-अलग सुविधाएं होती हैं । महिलाआें और पुरुषों के लिए पंक्तियां भी अलग-अलग होती हैं । इससे महिलाआें पर अन्याय होता है, यह हम नहीं मानते; क्योंकि, सब जानते हैं कि यह व्यवस्था महिलाआें की सुरक्षा और सुविधा के लिए बनाई गई है । परंतु, मंदिरप्रवेश के विषय में यह कहना कि यहां ‘लिंगभेद’ है, सर्वथा अनुचित है । यहां धार्मिक परंपराआें के मूल में स्थित धर्मशास्त्रीय कारणों को समझना चाहिए ।

५. भारत में ‘समानता’ की विचारधारा, दूसरों पर अन्याय करना सिखानेवाली यूरोपीय देशों में जन्मी साम्यवाद से आई है । इसके विपरीत, लाखों वर्ष की परंपरावाला विश्‍वव्यापी हिन्दू धर्म कहता है कि ‘शिव और शक्ति (पुरुष-स्त्री) एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं ।’

६. कांग्रेसी और वामपंथी एक ओर लिंग-समानता और सामाजिक न्याय के विषय में लंबी-लंबी गप्पें हांकते हैं, तो दूसरी ओर तीन तलाकविरोधी कानून का विरोध करते हैं ।

७. एक ओर तीन तलाक, हलाला जैसी कुप्रथाआें के विषय में मौन रहना, लैंगिक अत्याचार करनेवाले पादरियों के विषय में एक शब्द भी न बोलना, तो दूसरी ओर हिन्दुआें की प्रथाएं तोडने का समर्थन करना, यह कैसा परिवर्तनवाद है ?

८. धर्मनियम तोडकर स्त्रीमुक्ति का उद्देश्य कैसे साध्य होगा ? क्या ऐसा करने से महिलाआें पर होनेवाले अत्याचार रुक जाएंगे ?

९. नास्तिक सीपीआई (एम) वालों को तो देवता के विषय में बात करने का नैतिक आधार भी नहीं है । फिर भी, वे इस विषय में बात करते हैं, तो इससे स्पष्ट होता है कि वे केवल हिन्दूविरोध के लिए स्त्री-पुरुष समानता का स्टंट कर रहे हैं ।

आधुनिकतावादियो, धर्म में स्त्री का स्थान केवल समानता तक सीमित नहीं, अपितु उससे भी अधिक पूज्य है, यह समझ लें !

१. सनातन वैदिक धर्म में एक वचन है, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।’ अर्थात, जहां नारी की पूजा (सम्मान) होती है, वहां देवता वास करने हैं ।

२. हिन्दू धर्म और उसकी परंपराआें में जितना महिलाआें का विचार किया गया है, उतना अन्य पंथों में नहीं । हिन्दू धर्म में महिलाआें को देवी का स्थान है और उनकी पूजा की जाती है । हिन्दुआें में स्त्री देवताआें की संख्या सर्वाधिक है । परिवार का कोई भी धार्मिक कृत्य पत्नी के साथ रहे बिना पूरा नहीं होता । अनेक धार्मिक कृत्य, उदा. हरतालिका व्रत, कुमारिका पूजन में महिलाआें की पूजा की जाती है । महिलाआें के सम्मान के ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं । इससे पता चलता है कि हिन्दू धर्म में महिलाआें को कितना उच्च स्थान दिया गया है !

इसलिए, साम्यवादियों का हिन्दुआें को स्त्री-पुरुष समानता सिखाना हास्यास्पद है !

धर्माभिमान जागृत रखनेवाली, ‘रेडी टू वेट’ अभियान

‘पीपल फॉर धर्म’ की अध्यक्षा शिल्पा नायर ने ‘हिन्दू पोस्ट’ वेब पोर्टल पर कुछ महीने पहले एक ऑनलाईन अभियान चलाया था, जिसका नाम था, ‘रेडी टू वेट’ । अर्थात, हम प्रतीक्षा करने के लिए तैयार हैं ।

हमारी परंपराआें की रक्षा दूसरे लोग न करें । इसके लिए हम महिला भक्तों को ही आगे आकर अपने परमेश्‍वर के आदेश का पालन करेन का संकल्प करना चाहिए । इसी विचार से इस ‘रेडी टू वेट’ नामक अभियान का जन्म हुआ है । मंदिर में प्रवेश के लिए ‘पचास वर्ष की अवस्था होने तक हम रुकने के लिए तैयार हैं’; यह इच्छा प्रदर्शित करनेवाली लाखों महिलाआें ने इस अभियान में भाग लेकर, हिन्दू धर्म पर कौआें की भांति टूट पडनेवाले बुद्धिवादियों को अचंभित कर दिया । जिन्हें केरल के मंदिरों की परंपराआें का रत्तीभर भी ज्ञान नहीं है, ऐसी कुछ महिलाएं यह कहती हैं कि समानता लाने के लिए परंपरा तोडो, तो हमारा उनसे प्रश्‍न है कि हमें हमारे धर्म ने जो विशेष अधिकार दिया है, उसे समानता के नाम पर हम क्यों छोडें ?’ यह विचार शिल्पा नायर ने व्यक्त किया है ।

हिन्दुत्वनिष्ठों की मांग !

१. संविधान ने भारतीय नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का जो अधिकार दिया है, वह हिन्दुआें और उनके मंदिरों के लिए भी है । यह अधिकार सुरक्षित रहे, यह देखना सरकार का कर्तव्य । इस दृष्टि से जिस प्रकार, कुछ वर्ष पहले शाहबानो प्रकरण में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने तथा वर्तमान सरकार ने एस.सी./एस.टी. एक्ट के विषय में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को परिवर्तित कर नया कानून बनाया; उसी प्रकार, आजकल हिन्दुआें की धार्मिक परंपराआें पर तथाकथित सेकुलरवादी जो आघात कर रहे हैं, उसे रोकने के लिए और हिन्दुआें के धार्मिक परंपराआें की रक्षा के लिए केंद्र सरकार कानून बनाए ।

२. बंदी बनाए गए ३ सहस्त्र ५०० आंदोलनकारी भक्तों पर पंजीकृत आरोप निरस्त किए जाएं और उन्हें तुरंत कारागार से मुक्त किया जाए ।

३. अहिन्दुआें ने हिन्दुआें के धार्मिक विषयों में हस्तक्षेप किया, जिससे कानून-व्यवस्था बिगडी और सामाज में तनाव उत्पन्न हुआ । रेहाना फातिमा को ‘फेसबुक’ पर आपत्तिजनक लेख लिखने पर हाल ही में बंदी बनाया गया था । कविता जक्कल और मेरी स्वीटी को भी तुरंत बंदी बनाकर उनके विरुद्ध उचित कार्यवाही की जाए ।

वहीं दूसरी ओर दिखाई दिया कि अन्य सहस्त्रों महिलाआें ने प्रथा-परंपराआें के पालन को महत्त्व दिया । (इससे सिद्ध होता है कि हिन्दू अपनी धार्मिक परंपरा का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध थे ! सभी हिन्दुआें के लिए केरल के हिन्दुआें का यह आचरण आदर्श है ! – संपादक)

संवैधानिक और न्यायालयीन वास्तविकता जानिए !

१. संविधान ने प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्मानुसार आचरण करने का अधिकार दिया है । यह अधिकार हिन्दुआें और उनके मंदिरों को भी है । इस निर्णय से हिन्दुआें के धर्मपालन अधिकार पर आंच आ रही है, यदि ऐसा किसी हिन्दू को लगे, तो अनुचित न होगा ।

२. शबरीमला मंदिर की परंपरा का विरोध करने के लिए देश की एक भी महिला भक्त ने न्यायालय में याचिका नहीं डाली । परंतु, मुसलमान महिला नौशाद उस्मान खान की हिन्दुआें की धार्मिक परंपरा से संबंधित याचिका पर न्यायालय ने हिन्दू मंदिर की ८०० वर्ष की परंपरा खंडित कर दी । उसी समय एक हिन्दू याचिकाकर्ता ने मसजिदों में मुसलमान महिलाआें को प्रवेश देने के संबंध में याचिका डाली, तो न्यायालय ने उसे निरस्त कर दिया । न्यायालय का यह व्यवहार, समझ के परे तथा पक्षपातपूर्ण लगता है ।

३. शबरीमला मंदिर में १० से ५० वर्ष की महिलाआें के प्रवेश प्रकरण में उच्चतम न्यायालय अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे, इसके लिए १९ लोगों ने याचिका डाली है ।

४. शबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति देनेवाली ५ न्यायाधीशों की खंडपीठ की एकमात्र महिला न्यायाधीश इंदू मल्होत्रा ने अनुमति का विरोध किया था । महिलाआें के विषय में महिला न्यायाधीश के मत को नहीं, पुरुष न्यायाधीशों के मत को महत्त्व है, यह कहना जितना अनुचित है, उतना ही अनुचित है, यह कहना कि स्त्री-पुरुष समानता के लिए मंदिर में सभी अवस्था की महिलाआें को प्रवेश मिलना चाहिए ।

५. डान्सबार के कारण वस्तुतः महिलाएं ही असुरक्षित होती हैं । समाज को लगता है कि एक ओर न्यायालय कहता है कि मंदिर में जानेवाली महिलाआें को सुरक्षा दीजिए, तो दूसरी ओर डान्सबार को अनुमति देते समय बार की महिलाआें की सुरक्षा का विचार ही नहीं किया जाता ।

६. न्यायालय ने विवाहबाह्य संबंधों को मान्यता दी है । परंतु, विवाहबाह्य संबंधों के कारण अपराध बढ रहे हैं, यह वास्तविकता है । विवाहबाह्य संबंधों के कारण अनेक स्त्रियों पर अत्याचार होते हैं । फिर भी, इस संवेदनशील विषय पर कोई नहीं बोलता ।

७. हिन्दू महिला और मुसलमान पुरुष के विवाह से उत्पन्न संतान को पिता की संपत्ति में अधिकार है; परंतु हिन्दू महिला को अपने मुसलमान पति की संपत्ति में अधिकार नहीं रहेगा, यह निर्णय उच्चतम न्यायालय का है । आधुनिकतावादियों और स्त्रीमुक्तिवादियों को क्यों नहीं लगता कि यह निर्णय महिलाआें के लिए अन्यायकारी है ?

कथित स्त्री-पुरुष समानता के नाम पर उच्चतम न्यायालय के कंधे पर बंदूक रखकर, हिन्दुआें के धार्मिक स्थानों को निशाना बनाया जा रहा है ।

प्रधानमंत्री से हिन्दुआें की अपेक्षा है कि वे हिन्दुआें पर होनेवाले आघात रोकें !

शबरीमला प्रकरण में कांग्रेस की नीति दोहरी है । कम्युनिस्ट पार्टी भारत के इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म का सम्मान नहीं करती । फिर भी, उससे हिन्दुआें के प्रति द्वेषपूर्ण व्यवहार की आशा नहीं थी । केरल सरकार का यह द्वेषपूर्ण व्यवहार इतिहास की सबसे निंदनीय घटना है !

– प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

रथयात्रा निकाल कर समय और पैसा व्यय करने से उत्तम है, धार्मिक परंपराआें का पालन करने के लिए केंद्र में सत्तासीन भाजपा सरकार सीधा अध्यादेश जारी करे !

केरल सरकार के विरुद्ध और शबरीमला मंदिर की रक्षा के लिए भाजपा ने रथयात्रा’ निकाली !