पूजामें उपयुक्त विविध घटकोंका महत्त्व
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सारणी -
- १. पूजासामग्रीका महत्त्व
- २. पूजाकी थालीमें विविध घटकोंकी रचना किस प्रकार करें ?
- ३. पूजासामग्रीके घटकोंका महत्त्व व विशेषताएं
१. पूजासामग्रीका महत्त्व
देवतापूजनमें पूजासामग्री होना आवश्यक ही है । यह घटक ईश्वरीय कृपा प्राप्त होनेमें महत्त्वपूर्ण कडी है । प्रत्येक घटकका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व समझ लेनेसे, इन घटकोंके प्रति मनमें भाव निर्माण होता है और धार्मिक व सामाजिक कृति अधिक भावपूर्ण हो पाती है । इसी उद्देश्यको ध्यानमें रखते हुए यहां हलदी, कुमकुम, तिलक, पुष्प, अक्षत, बाती, श्रीफल, उदबत्ती, कर्पूर आदिका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व व उसकी विशेषताएं बताई गई हैं ।
२. पूजाकी थालीमें विविध घटकोंकी रचना किस प्रकार करें ?
`थालीमें जीवकी दाहिनी ओर हलदी-कुमकुम व बाईं ओर बुक्का (अभ्रक धातुका चूर्ण), गुलाल और सिंदूर रखें ।
थालीमें सामने इत्रकी डिब्बी, तिलक (चंदन)की छोटी थाली और पुष्प, दूर्वा व पत्री रखें । इत्र, तिलक व पुष्पके गंध-कणोंके कारण तथा दूर्वा व पत्रीके रंग-कणोंके कारण देवताओंकी सूक्ष्म-तरंगें कार्यरत होती हैं ।
थालीमें नीचेकी दिशामें पान-सुपारी व दक्षिणा रखें; क्योंकि पान-सुपारी देवताओंकी तरंगें प्रक्षेपित करनेका एक प्रभावी माध्यम है ।
मध्य भागमें सर्वसमावेशक अक्षत रखें । अक्षतके थालीका केंद्रबिंदु बननेसे उसकी ओर शिव, श्री दुर्गादेवी, श्रीराम, श्रीकृष्ण व गणपति, इन पांच उच्च देवताओंकी तत्त्व-तरंगें आकर्षित होती हैं । ये तरंगें आवश्यकतानुसार उसकी चारों ओर गोलाकारमें रखे कुमकुम, हलदी इत्यादि घटकोंकी ओर प्रक्षेपित होती हैं ।
३. पूजासामग्रीके घटकोंका महत्त्व व विशेषताएं
सप्तनदियोंका जल: गंगा, गोदावरी, यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरी व नर्मदाके जल अर्थात् सप्तनदियोंके एकत्रित जलको पूजाके कलशमें डालते हैं । वर्तमान कालमें सप्तनदियोंका जल सरलतासे उपलब्ध नहीं होता । पूजा हेतु कलशमें डालनेके लिए सप्तनदियोंका जल उपलब्ध न हो, तो सामान्य जलका प्रयोग करते हैं । यह जल डालते समय `गंगे च यमुनेचैव ।' इस मंत्रका उच्चारण कर सप्तनदियोंका आवाहन किया जाता है ।
रुईके वस्त्र: रुईके वस्त्र जीवके शरीरकी सुषुम्नानाडीका प्रतिनिधित्व करते हैं । रुईका धागा बनाते समय दूधकी अपेक्षा चंदनका प्रयोग करें । चंदनके अनुलेपनसे देवताओंकी तरंगें शीघ्र कार्यरत होकर, रुईके वस्त्रकी ओर आकर्षित होती हैं । ये सात्त्विक वसन (वस्त्र) देवताके गलेमें पहनानेसे देवता अपना सगुण रूप शीघ्र साकार कर, जीवके लिए कम कालावधिमें कार्य करते हैं ।
जनेऊ: `देवताओंको जनेऊ अर्पण करना (पहनाना), अर्थात् देवताओंके व्याप्त प्रकाशको जनेऊके धागेके वलयमें मर्यादित कर, उन्हें द्वैतके कार्य हेतु आवाहन करना । जनेऊ धागोंसे बनाया जाता है तथा मंत्रशक्तिसे लैस होता है । जनेऊ अर्पण करना, पूजाविधिमें द्वैत-अद्वैत अनुसंधान साधनेकी एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है । पूजा के उपरांत जब जीव जनेऊ धारण करता है, तो उसे देवताके सात्त्विक चैतन्यका लाभ मिलता है ।
गुलाल, शुद्ध कुमकुम और हल्दी: गुलालके कारण वायुमंडलकी चैतन्ययुक्त सुप्त-तरंगें प्रवाही बन जाती हैं । शुद्ध हलदीकी सुगंधका बोध उसे सूंघनेपर होता है । शुद्ध कुमकुमका स्पर्श बर्फ समान ठंडा होता है । इस कुमकुमको माथेपर लगानेसे अनिष्ट शक्तियां भ्रूमध्यसे प्रवेश नहीं कर सकतीं ।
पुष्प: तुलसी (मंजिरी), गेंदा, गुलाब, केवडा इत्यादि पुष्पोंकी सुगंध मंद होती है और उनमें गुरुतत्त्वको आकर्षित करनेकी क्षमता अधिक रहती है । सूर्योदयके उपरांत भी खिलनेवाले पुष्प चढाना, कागजके पुष्प चढाने समान ही है ।
अक्षत: पूजाविधिके प्रत्येक घटकपर तथा देवताकी मूर्तिपर पंचोपचार अथवा षोडशोपचारके उपरांत, अक्षत छिडककर सबमें विद्यमान देवत्वको जागृत कर, उन्हें कार्यके लिए आवाहन करते हैं । पंचोपचार-पूजामें कोई घटक अनुपलब्ध हो, तो अक्षतका उपयोग किया जाता है । इसलिए अक्षत सर्व देवताओंके तत्त्वोंको समा लेनेवाला अर्थात् पूजाविधिमें महत्त्वपूर्ण सर्वसमावेशक माध्यम है ।
नारियल: नारियलमें शिव, दुर्गा, गणपति, श्रीराम व श्रीकृष्ण, इन पांच देवताओंकी तरंगें आकृष्ट करनेकी व उन्हें आवश्यकताके अनुसार प्रक्षेपित करनेकी क्षमता होती है । इसलिए नारियलको सर्वाधिक शुभ फल अर्थात् श्रीफल, सर्वाधिक सात्त्विकता प्रदान करनेवाला फल कहते हैं ।
उदबत्ती: उदबत्तीमें देवताओंसे प्रक्षेपित सूक्ष्म-गंध ग्रहण करनेकी क्षमता है । इसलिए उदबत्ती लगानेपर उससे उसकी सुगंधके साथ-साथ उक्त सूक्ष्म-गंध भी प्रक्षेपित होती है । उदा. जब चंदनकी उदबत्ती लगाई जाती है तब देवताओंसे आकृष्ट चंदनकी सूक्ष्म-गंध भी उदबत्तीकी सुगंधके साथ प्रक्षेपित होती है ।
धूप: धूपकी सुगंध तीव्र होती है । इस सुगंधसे विशिष्ट देवताका तत्त्व कार्यरत होकर, वह धूपके धुएंके माध्यमसे सूक्ष्म-शस्त्रोंका रूप लेकर वातावरणके रज-तमसे लडती है, जिससे वातावरणमें सत्त्वगुणकी प्रबलता बढ जाती है और स्वाभाविक ही वातावरण तथा वास्तुकी शुद्धि होती है । इस हेतु पूजा अथवा आरतीसे पहले धूप दिखाना योग्य होता है ।
कर्पूर: कर्पूर जलानेसे उत्पन्न सूक्ष्म वायुकी उग्र गंधमें शिवगणोंको आकृष्ट करनेकी क्षमता अधिक होती है । कर्पूरकी सुगंधके कारण श्वासद्वारा शरीरमें शिवतत्त्व प्रवेश करता है ।
नैवेद्य (भोग): प्रत्येक देवताका नैवेद्य निर्धारित होता है । उस देवताको वह नैवेद्य प्रिय होता है, उदा. श्रीविष्णुको खीर अथवा सूजीका हलवा, गणेशजीको मोदक, देवीको पायस । उस विशिष्ट नैवेद्यमें उस विशिष्ट देवताकी शक्ति अधिक आकृष्ट होती है । तदुपरांत वह नैवेद्य, अर्थात् प्रसाद हमारे द्वारा ग्रहण किए जानेपर उसमें विद्यमान शक्ति हमें प्राप्त होती है ।
दक्षिणा: दक्षिणा रखनेसे जीवमें त्यागकी भावना निर्माण होती है । हिंदू धर्मका मूल त्यागमें छुपा है । दक्षिणा देकर त्याग सीखना कर्मकांडकी पहली सीढ़ी है । इसीलिए दक्षिणा देनेका महत्त्व अनन्यसाधारण है । दक्षिणा कभी भी अकेले नहीं दी जाती । सुपारी अथवा नारियलको पानके पत्तोंपर रखकर देना महत्त्वपूर्ण है ।
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अधिक जानकारी हेतु अवश्य पढे सनातनका ग्रंथ - पूजासमग्रीका महत्त्व |
सनातन संस्था विश्वभरमें धर्मजागृति व धर्मप्रसारका कार्य करती है । इसीके अंतर्गत इस लेखमें `पूजाकी थालिमें विविध घटकोंकी रचना किस प्रकार करें तथा पूजामें उपयुक्त विविध घटकोंका महत्त्व' इस विषयपर अंशमात्र जानकारी प्रस्तुत की गई है । अधिक जानकारीके लिए संपर्क करें: sanatan@sanatan.org

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