पितृपक्षमें दत्तात्रेय देवताका नामजप क्यों करते है?
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सारणी -
- १. पितृपक्ष (महालयपक्ष)
- २. पितृपक्षमें श्राद्ध क्यों करना चाहिए ?
- ३. पितृपक्षमें की जानेवाली आध्यात्मिक व धार्मिक कृतियोंका आधारभूत शास्त्र
- ४. पितृपक्षमें दत्तात्रेय देवताका नाम जपनेका महत्त्व
- ५. दत्तात्रेयके नामजपद्वारा पूर्वजोंके कष्टोंसे रक्षण कैसे होता है ?
- ६. सर्वपित्री अमावस्या
१. पितृपक्ष (महालयपक्ष)
आश्विनके कृष्णपक्षको `पितृपक्ष' कहते हैं । यह पक्ष पितरोंको प्रिय है । पितृपक्षकी कालावधिमें पितर पृथ्वीके निकट आते हैं । इन अतृप्त आत्माओंको (पितरोंको) शांत करनेके लिए इस कालमें श्राद्धविधि की जाती है । इस पक्षमें पितरोंका महालय श्राद्ध करनेसे वे वर्षभर तृप्त रहते हैं ।
२. पितृपक्षमें श्राद्ध क्यों करना चाहिए ?
पितृपक्षमें वातावरणमें कष्टदायक तरंगोंकी प्रबलता होती है । पितृपक्षमें श्राद्ध करनेसे पितरोंके लिए पृथ्वीकी वातावरण कक्षामें आना सरल होता है । इसीलिए हिंदू धर्ममें बताए गए विधिकर्म विशिष्ट कालावधिमें करना अधिक श्रेयस्कर है । पूर्वजोंकी अतृप्त वासनाओंके परिणामस्वरूप उनके परिवारजनोंको कष्ट होनेकी संभावना होती है । उदा. दारू-सिगरेटका व्यसन लगना । पितृपक्षमें महालय श्राद्ध करनेसे मृत्युलोकमें अटके हुए पूर्वजोंको गति प्राप्त होती है तथा उनके कारण हमारे कष्टोंका निवारण होता है ।
३. पितृपक्षमें की जानेवाली आध्यात्मिक व धार्मिक कृतियोंका आधारभूत शास्त्र
पूर्वज अतृप्त होते हैं, इस कारण उनकी इच्छा तृप्त करने हेतु `पक्ष' किया जाता है ।
पूर्वजोंके वंशज व उनके किसी न किसी रूपमें अटके हुए वंशजके ऋणानुबंधसे मुक्त होनेके लिए श्राद्धपक्ष करना पड़ता है ।
इन पंद्रह दिनोंमें अतृप्त आत्माओंको शांति न देनेपर, वे २१० दिन वंशको किसी न किसी माध्यमसे कष्ट देकर हानि पहुंचाती हैं । अत: श्राद्धपक्ष करना आवश्यक है ।
जबतक प्रत्येक आत्माको शांति नहीं मिलती, तबतक उसे आगेकी गति नहीं प्राप्त होती । इस कारण वह भटकती रहती है । अत: उन्हें भोजन देनेके माध्यमसे, वर्षमें एक बार शांति देनेके रूपमें कृति इस कालावधिमें की जाती है ।
३.१ शास्त्रीय पद्धतिसे की जानेवाली विधि
अतृप्त आत्माको प्रथम दही-चावलका नैवेद्य दिखाएं
पांच ब्राह्मणोंके हाथोंसे पूजाविधि करें
पांच ब्राह्मणोंको भोजन करवाएं
घरका प्रत्येक व्यक्ति `श्री गुरुदेव दत्त ।' नामजप सामूहिक रूपसे एक घंटा करे ।
जहांतक संभव हो, पूजाके समय रखे गए पूर्वजोंके छायाचित्र नामजपके उपरांत तुरंत हटा दें । (आत्मा छायाचित्रमें स्वयंका स्थान निर्माण करती है । अत: छायाचित्र तुरतं हटा दें ।)
३.२ भोजनका महत्त्व
इस दिन सर्व सब्जियां एकत्रित कर सब्जी बनाई जाती है । इसके पीछे कारण निम्न प्रकारसे हैं ।
१. पितरोंकी किसी भी बातकी इच्छा शेष न रहे
२. जब अनेक घटक एकत्रित आते हैं, तब उनके मिश्रणसे बाहर निकलनेवाली तरंगें वातावरणमें प्रक्षेपित होती हैं, अस्थिर आत्मा स्थिर होती है व कुछ क्षणोंमें वह आसक्ति विरहित होकर वहांसे चली जाती है ।
इस दिन पितरोंको नैवेद्य दिखाकर व ब्राह्मणोंको भोजन देनेके पश्चात् ही घरके अन्य सदस्य भोजन करें ।
३.३ पितृपक्षके लिए धार्मिक विधि करते समय निम्न बातें ध्यानमें रखें !
श्राद्ध जैसी विधियोंमें दत्तात्रेय देवताका विशेष महत्त्व है । श्राद्धकी विधि भावपूर्ण व सात्त्विक करनेके लिए निम्न बातें ध्यानमें रखें ।
जिस कमरेमें विधि कर रहे हों, वहां दत्तात्रेयकी नामजप-पटि्टयां लगाएं ।
दत्तात्रेयका नामजप ध्वनिमुद्रित कैसेट, विधिके आरंभसे लेकर अंततक धीमी आवाज़में बजाएं ।
श्राद्धसे पहले सनातन संस्थाद्वारा प्रकाशित दत्तात्रेयके सात्त्विक चित्रका पूजन व आरती करें ।
उक्त बातोंके कारण श्राद्धकी विधिमें अनिष्ट शक्तियोंकी अड़चनें कम मात्रामें आती हैं । दत्तात्रेयकी शक्ति व उनका चैतन्य विधिके स्थलपर प्रक्षेपित होता है, साधकोंको शक्ति व चैतन्यका लाभ मिलता है और उनका अनिष्ट शक्तिसे संरक्षण होता है ।
४. पितृपक्षमें दत्तात्रेय देवताका नाम जपनेका महत्त्व
पितृपक्षमें श्राद्ध विधिके साथ-साथ दत्तात्रेयका नामजप करनेसे पूर्वजोंके कष्टसे रक्षण होनेमें सहायता मिलती है । इसलिए पितृपक्षमें दत्तात्रेयका नामजप कमसे कम ९ माला करें ।
५. दत्तात्रेयके नामजपद्वारा पूर्वजोंके कष्टोंसे रक्षण कैसे होता है ?
पूर्वजोंको गति मिलना: कलियुगमें अधिकांश लोग साधना नहीं करते, अत: वे मायामें फंसे रहते हैं । इसलिए मृत्युके उपरांत ऐसे लोगोंकी लिंगदेह अतृप्त रहती है । ऐसी अतृप्त लिंगदेह मर्त्यलोक (मृत्युलोक) में फंस जाती है । (मृत्युलोक, भूलोक व भुवलोकके बीचमें है ।) मृत्युलोकमें फंसे पूर्वजोंको दत्तात्रेयके नामजपसे गति मिलती है; वे अपने कर्मानुसार आगेके लोककी ओर अग्रसर होते हैं । अत: स्वाभाविक ही उनसे संभावित कष्ट कम हो जाते हैं ।
घरके मृत व्यक्तियोंकी यादमें घरमें उनके छायाचित्र लगाना, पूजाघरमें सिक्के रखना अथवा घरके सामने स्थान बनाना तथा उसपर नियमितरूपसे फूल चढाकर पूजा करना, ऐसी कृतियोंके कारण पूर्वज अटके रहते हैं । उन्हें गति नहीं मिल पाती व उन्हें यातनाएं भी सहनी पडती हैं । भगीरथने पूर्वजोंकी मुक्तिके लिए तपस्या कर गंगाको पृथ्वीपर लाया, यह पितृऋण उतारनेका आदर्श उदाहरण है । यदि हम पूर्वजोंको उपरोक्त अनुसार अटकाए रखेंगे व उनकी गति हेतु नामजपादि साधना भी नहीं करेंगे तो हम पितृऋण चुका नहीं पाएंगे । परिणामस्वरूप पूर्वजोंको कष्ट होगा व वे हमारी साधनामें अडचनें निर्माण होंगी । पितृऋण चुकानेके लिए व पूर्वजोंको गति प्रदान करने हेतु दत्तात्रेय देवताका `श्री गुरुदेव दत्त ।' नामजप व श्राद्धविधि करें ।
दत्तात्रेयके नामजपसे निर्मित शक्तिद्वारा नामजप करनेवालेके आसपास सुरक्षाकवच निर्माण होता है ।
६. सर्वपित्री अमावस्या
पितृपक्षकी अमावस्याको सर्वपित्री अमावस्या कहते हैं । इस तिथिपर कुलके सर्व पितरोंको उद्देशित कर श्राद्ध करते हैं । वर्षभरमें सदैव व पितृपक्षकी अन्य तिथियोंपर श्राद्ध करना संभव न हो, तब भी इस तिथिपर सबके लिए श्राद्ध करना अत्यंत आवश्यक है; क्योंकि पितृपक्षकी यह अंतिम तिथि है । उसी प्रकार, शास्त्रमें बताया गया है कि, श्राद्धके लिए अमावस्याकी तिथि अधिक योग्य है, जबकि पितृपक्षकी अमावस्या सर्वाधिक योग्य तिथि है ।
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अधिक जानकारी हेतु अवश्य पढे सनातनका ग्रंथ - श्राद्धकी कृतियोंका आधारभूत शास्त्र |
सनातन संस्था विश्वभरमें धर्मजागृति व धर्मप्रसारका कार्य करती है । इसीके अंतर्गत इस लेखमें `पितृपक्षमें श्राद्ध करनेका महत्त्व, ब्राह्मणोंको भोजन करवानेका महत्त्व तथा अनिष्ट शक्तियोंके कष्टपर क्या उपाय करें ?' इस विषयपर अंशमात्र जानकारी प्रस्तुत की गई है । अधिक जानकारीके लिए संपर्क करें : sanatan@sanatan.org

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