मृत व्यक्तिके मुखमें तुलसीदल क्यों रखते हैं ?
सारणी -
- १. मृत्योपरांत कृतियोंका शास्त्रीय महत्त्व
- २. किसीकी मृत्यु हो जानेपर क्या करें ?
- ३. अंत्ययात्राकी तैयारी व दहनविधि कैसे करें ?
- ४. मृत व्यक्तिके मुखमें गंगाजल डालकर तुलसीदल क्यों रखते हैं ?
- ५. मृत व्यक्तिको अर्थीपर आडे लिटाकर, उसके पैरोंके अंगूठेको अंगूठेसे क्यो बांधते है?
- ६. गेहूंके (गूंदे हुए) आटेपर दीप क्यों व किस दिशामें जलाएं ?
- ७. विद्युत् दाहसंस्कार न कर, विधिवत् करें
- ८. दहनोपरांत चिताके आस-पास मटकीके जलको गिराते हुए परिक्रमा लगाएं
- ९. चिताके धुएंका स्पर्श शरीरको क्यों न होने दें ?
- १०. दहनविधि उपरांत उसी दिनकी कृतियां
- ११. १ वर्षतकके बालकोंको अग्नि न देकर मृत्योपरांत दफनाया क्यों जाता है ?
- १२. स्त्रियां श्मशानमें क्यों न जाएं ?
- १३. तेरहवींतक कौनसी कृतियां आवश्यक हैं ?
१. मृत्योपरांत कृतियोंका शास्त्रीय महत्त्व
मृत्योत्तर क्रियाकर्मको श्रद्धापूर्वक व विधिवत् करनेपर मृत व्यक्तिको सद्गति प्राप्त होती है । पूर्वजोंकी अतृप्तिके कारण, परिजनोंको होनेवाले कष्टों तथा अनिष्ट शक्तियोंद्वारा लिंगदेहके वशीकरणकी संभावना भी कम हो जाती है । मृत्योत्तर क्रियाकर्मके प्रति शुष्क भाव समाप्त हो, इस दृष्टिसे यहां मृत्योपरांतकी कुछ विधियोंका अध्यात्मशास्त्रीय दृष्टिकोण दे रहे हैं । इससे स्पष्ट होगा कि, मनुष्यजीवनमें साधनाका महत्त्व अनन्यसाधारण है ।
२. किसीकी मृत्यु हो जानेपर क्या करें ?
मृतकका सिर दक्षिणमें तथा पैर उत्तर दिशामें हों, इस प्रकार लिटाएं । उसके मुखमें गंगाजल / विभूति-जल डालें और तुलसीदल रखें । तुलसीदलके गुच्छेसे मृत व्यक्तिके कानों और नासिकाओंको बंद करें । परिवारका विधिकर्ता पुरुष अपना सिर मुडवाए । (केश कष्टदायक तरंगोंको आकर्षित करते हैं । मृत्योपरांत कुछ समयके लिए जीवकी सूक्ष्म देह परिजनोंके आस-पास ही घूमती रहती है । उससे प्रक्षेपित रज-तम तरंगें परिजनोंके केशके काले रंगकी ओर आकर्षित होते हैं । इस कारण सिरदर्द, सिरमें भारीपन, अस्वस्थता, चक्कर आना जैसे कष्ट होते हैं । मृत्योत्तर क्रियाकर्ममें पुरुष प्रत्यक्ष सहभागी होते हैं, इसलिए उन्हें ऐसे कष्ट होनेकी आशंका अधिक रहती है । इसलिए वे अपना सिर पूरा मुडवाएं ।) `श्री गुरुदेव दत्त ।' का जाप ऊंचे स्वरमें करते हुए, मृत व्यक्तिको नहलाएं । गोमूत्र अथवा तीर्थ छिडककर, यदि संभव हो तो धूप दिखाकर, शुद्ध किए गए नए वस्त्र मृत व्यक्तिको पहनाएं । घरमें गेहूंके आटेका गोला बनाकर उसपर मिट्टीका दीप जलाएं । दीपकी ज्योति दक्षिण दिशाकी ओर हो ।
३. अंत्ययात्राकी तैयारी व दहनविधि कैसे करें ?
मृत व्यक्तिको बांसकी अर्थीपर लिटाकर उसके पैरोंके अंगूठोंको एक साथ बांधें । अंत्ययात्रामें विधिकर्ता एक मटका साथ ले, जिसमें अग्नि प्रज्वलित की गई हो । अंत्ययात्रामें उपस्थित सर्व लोग ऊंचे स्वरमें `श्री गुरुदेव दत्त ।' का जाप करें । श्मशानमें विधिकर्ता चिताको अग्नि दे । मृतदेहके पूर्ण दहन हो जानेपर विधिकर्ता कंधेपर जलका मटका लेकर उसमें पत्थरसे (अश्मसे) छिद्र कर, घडीकी सुइयोंकी विपरीत दिशामें जलका घेरा बनाते हुए चिताकी तीन परिक्रमाएं करे । उसके उपरांत मटकेको कंधेसे पीछेकी ओर गिराकर तोड दे ।
४. मृत व्यक्तिके मुखमें गंगाजल डालकर तुलसीदल क्यों रखते हैं ?
मृत व्यक्तिके मुखसे दूषित तरंगें निकलती हैं, जिनके कारण अनिष्ट शक्तियां मृतदेहकी ओर आकर्षित होती हैं और उसे अपने वशमें कर लेती हैं । मृत व्यक्तिके मुखमें गंगाजल डालकर तुलसीदल रखनेसे उनकी ओर आकर्षित सात्त्विक तरंगें दूषित तरंगोंको नष्ट करती हैं । मृत व्यक्तिके कान व नाकको कपासके गोलोंसे बंद करनेकी अपेक्षा, उन्हें तुलसीदलसे बंद करें ।
५. मृत व्यक्तिको अर्थीपर आडे लिटाकर, उसके पैरोंके अंगूठेको अंगूठेसे क्यो बांधते है?
दहनविधि हेतु ले जानेसे पूर्व मृत व्यक्तिको अर्थीपर आडे लिटाकर उसके पैरोंके अंगूठेको अंगूठेसे बांधनेके कारण, उसके शरीरकी दाहिनी व बाईं नाडीके संयोगसे मृतदेह सूक्ष्म कष्टदायक वायुओंसे मुक्त हो जाती है तथा अनिष्ट शक्तियां उसपर सहज नियंत्रण प्राप्त नहीं कर सकतीं ।
६. गेहूंके (गूंदे हुए) आटेपर दीप क्यों व किस दिशामें जलाएं ?
व्यक्तिकी मृत्यु हो जानेपर उसमें कष्टदायक तरंगोंका भ्रमण जारी रहता है । अन्योंको इससे कष्ट न हो, इस हेतु वहां दीप जलाएं । ज्योतिका मुख दक्षिण दिशाकी ओर हो । दक्षिण दिशाके (मृत्युके) देवता `यम' से प्रक्षेपित तेजतरंगें कष्टदायक तरंगोंका विघटन करती हैं । आटेके कारण ज्योतिकी ओर आकर्षित तेजतरंगें दीर्घकालतक संजोई जाती हैं ।
७. विद्युत् दाहसंस्कार न कर, विधिवत् करें
मानवनिर्मित अशुद्ध लोहेका विद्युत्दाह यंत्र व विद्युत्प्रवाह रज-तमयुक्त व चैतन्यहीन है । इसलिए विद्युत्-दहनमें मृत व्यक्तिके शरीरसे वायुमंडलमें रज-तमका प्रक्षेपण होता है और वायुमंडल दूषित होता है । इस कारण विद्युत्-दहनसे मृत व्यक्तिको आगेकी गति हेतु उतना लाभ नहीं मिलता । विधिवत् दाहसंस्कारमें प्रयुक्त नैसर्गिक वस्तुओंमें (लकडी, उद इत्यादिमें) चैतन्य होता है । इसलिए एवं विधिवत् दाहसंस्कारमें मंत्रोच्चारके कारण मृत व्यक्तिको आगेकी गति मिलती है । अत: मंत्रोच्चारसहित मृतदेहका दहन करें ।
८. दहनोपरांत चिताके आस-पास मटकीके जलको गिराते हुए परिक्रमा लगाएं
मटकीके छिद्रसे गिरनेके कारण जलकी तरंगोंको गति प्राप्त होती है । परिणामस्वरूप उत्पन्न ऊर्जाके कारण वायुमंडलकी शुद्धि होती है । तीन बार परिक्रमा लगानेसे मृतदेहके आस-पास सूक्ष्म-मंडल बनता है । इससे मृत व्यक्तिको आगेकी गति मिलती है ।
९. चिताके धुएंका स्पर्श शरीरको क्यों न होने दें ?
मृतदेहके अंत्यसंस्कारकी अग्निकी ज्वालाओंका धुआं मृत व्यक्तिकी वासनाओंसे संबंधित है । कुछ अतृप्त लिंगदेह इस धुएंकी ओर आकर्षित होती हैं और इस धुएंके साथ-साथ किसी व्यक्तिकी देहमें प्रवेश कर सकती हैं । इसलिए अपने शरीरको इस धुएंका स्पर्श न होने दें ।
१०. दहनविधि उपरांत उसी दिनकी कृतियां
श्मशानसे लौटनेपर अश्मको घरके आंगनमें तुलसी-बिरवाके पास रखें । घरमें प्रवेश करनेसे पूर्व नीमका पत्ता चबाएं । तदुपरांत आचमन कर, अग्नि, जल, गोबर, श्वेत सरसों इत्यादि मांगलिक पदार्थोंको हाथसे स्पर्श करें और अश्मपर पैर रखकर घरमें प्रवेश करें । अपने आराध्यदेवताका नामजप करते हुए स्नान करें । मंत्रोच्चारण करते हुए परिजन अश्मपर तिलांजलि दें । भोजनके लिए कढी-चावल बनाकर, प्रथम वास्तुदेवता व स्थानदेवताको वह अर्पित करें और प्रसादके रूपमें सेवन करें ।
११. १ वर्षतकके बालकोंको अग्नि न देकर मृत्योपरांत दफनाया क्यों जाता है ?
एक वर्षतकके बालकपर संस्कारोंकी संख्या अत्यल्प होती है, इसलिए उन्हें नष्ट करने हेतु भिन्न अग्निसंस्कार करनेकी आवश्यकता नहीं रहती ।
१२. स्त्रियां श्मशानमें क्यों न जाएं ?
पुरुषोंकी तुलनामें स्त्रियोंमें मूलत: ही रजोगुणकी मात्रा अधिक रहती है । रजोगुणके कारण स्त्रियोंमें भावनाएं भी पुरुषोंकी तुलनामें अधिक होती हैं । श्मशानमें वे कष्टदायक स्पंदनोंसे पीडित अथवा बाधित हो सकती हैं । इसलिए स्त्रियां मृत्योत्तर क्रियाकर्म भी न करें ।
१३. तेरहवींतक कौनसी कृतियां आवश्यक हैं ?
तीसरे दिन: अस्थियां एकत्र कर प्रवाहित करें । (तीसरे दिन संभव न हो, तो प्रथम दिन ही करें ।)
दसवें दिन: नदीके तटपर अथवा किसी घाटपर स्थित शिवजीके अथवा कनिष्ठ देवताओंके देवालयमें पिंडदान करें ।
ग्यारहवें दिन: मृतकके लिए श्राद्ध करें ।
बारहवें दिन: वर्षके अंतमें और वर्षश्राद्धके पूर्व, सपिंडी श्राद्ध करना उचित है । यदि लगे कि, किसी कारणवश ऐसा करना संभव नहीं होगा, तो बारहवें दिन ही कर लें ।
तेरहवें दिन: शांतिविधि करें तथा मीठा भोजन बनाएं ।
काकबली (दसवे दिन किया जानेवाला श्राद्ध): दसवें दिन लिंगदेहको काक स्पर्शके माध्यमसे मंत्रोच्चारसे भारित पिंडयुक्त हविर्भाग दिया जाकर लिंगदेहके अन्नदर्शक आसक्तियुक्त रज-तमात्मरूपी संस्कारात्मक बंधनसे मुक्त करनेका प्रयत्न कर पृथ्वीमंडल भेदनेके लिए आवश्यक बल की आपूर्ति की जाती है ।
दसवें दिन काकका पिंडको स्पर्ष करना महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है ?
काकका काला रंग रज-तमदर्शक होनेसे, पिंडदानकी रज-तमात्मक कृतिसे संबंधित विधि जैसी होती है । वासनामें फंसा हुआ लिंगदेह भूलोक, मर्त्यलोक व स्वर्गलोक में अटके रहते हैं । ऐसे लिंगदेह पृथ्वीके वातावरण कक्षामें प्रवेश करनेपर काकके देहमें प्रवेश कर पिंडान्नका भक्षण करते हैं । मध्यका पिंड मुख्य लिंगदेहसे संबंधित होनेके कारण इस पिंडको काकका स्पर्ष करना महत्त्वपूर्ण माना जाता है ।
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अधिक जानकारी हेतु अवश्य पढे सनातनका ग्रंथ - मृत्यु व मृत्योत्तर क्रियाकर्म |
सनातन संस्था विश्वभरमें धर्मजागृति व धर्मप्रसारका कार्य करती है । इसीके अंतर्गत इस लेखमें `घरमें किसीकी मृत्यु हो जानेपर क्या-क्या तैयारी करें व अगले तेरह दिन की जानेवाली विधियोंकी शास्त्रीय जानकारी' इस विषयपर अंशमात्र जानकारी प्रस्तुत की गई है । अधिक जानकारीके लिए संपर्क करें : sanatan@sanatan.org

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