जन्मदिन तिथिके अनुसार ही क्यों मनाए?
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सारणी -
- १. भारतीय संस्कृति अनुसार जनमदिन मनाएं !
- २. तिथिके अनुसार जन्मदिन मनानेका महत्त्व
- ३. जन्मदिनपर कुछ निषिद्ध कृतियां व उनका आधारभूत शास्त्र
१. भारतीय संस्कृति अनुसार जनमदिन मनाएं !
आजकल हिंदू पश्चिमी संस्कृतिके समक्ष घुटने टेक रहे हैं । परिणामस्वरूप हमारी धार्मिक कृतियोंपर पश्चिमी संस्कृतिका अत्यधिक प्रभाव पडा है । ऐसी कृतियोंसे ईश्वरीय चैतन्य तो प्राप्त होता नहीं; साथ ही ये कृतियां आध्यात्मिक दृष्टिसे हानिकारक होती हैं । धार्मिक कृतियोंमें निश्चितरूपसे सूक्ष्ममें क्या प्रक्रिया होती है, यह समझनेसे उन कृतियोंकी सत्यतापर विश्वास होता है व स्वाभाविक ही धर्माचरणके प्रति श्रद्धाके दृढ़ होनेमें सहायता मिलती है ।
२. तिथिके अनुसार जन्मदिन मनानेका महत्त्व
जिस तिथिपर हमारा जन्म होता है, उस तिथिके स्पंदन हमारे स्पंदनोंसे सर्वाधिक मेल खाते हैं । इसलिए उस तिथिपर परिजनों एवं हितचिंतकोंद्वारा हमें दी गई शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद सर्वाधिक फलित होते हैं । इसलिए जन्मदिन तिथिनुसार मनाना चाहिए ।
२.१. अभ्यंगस्नान करना
जन्मदिनपर अभ्यंगस्नान वस्त्र पहने हुए ही करें । स्नान करते समय ऐसा भाव रखें कि, `स्नानका जल निर्मल व शुद्ध गंगाके रूपमें हमारे शरीरपर प्रवाहित हो रहा है और उससे हमारे देह एवं अंत:करणकी शुद्धि हो रही है ऐसा भाव रखें ।
स्नानके पश्चात् नए वस्त्र परिधान करें । नए वसन (वस्त्र) परिधान करना, अर्थात् अभ्यंगस्नानके माध्यमसे अपनी देहकी चारों ओर ईश्वरीय चैतन्यका प्रभामंडल (चैतन्यमय संरक्षककवच) तैयार करना ।
माता-पिता एवं अन्य ज्येष्ठ व्यक्तियोंको प्रणाम करें । ज्येष्ठोंके प्रति आदरभाव उत्पन्न होनेसे उसके मनकी मलिनता नष्ट होती है ।
कुलदेवताका अभिषेक करें अथवा उनकी भावपूर्ण पूजा करें ।
२.२. औक्षण (आरती उतारना)
जिसका जन्मदिन है, उसका औक्षण करें । `औक्षण' की कृतिसे जीवकी सूक्ष्मदेहकी शुद्धिमें सहायता मिलती है । औक्षण करवानेवाला एवं करनेवाला, दोनोंमें यह भाव रहे कि, `एक दूसरेके माध्यमसे प्रत्यक्ष ईश्वर ही यह कृतिस्वरूप कार्यद्वारा हमें आशीर्वाद दे रहे हैं' । कुलदेवता अथवा उपास्यदेवताका स्मरण कर अक्षत तीन बार जीवके सिरपर डालनेसे आशीर्वादात्मक तरंगोंका स्रोत जीवकी संपूर्ण देहमें संक्रमित होता है । इस प्रक्रियासे दोनों जीवोंकी देहसे प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगोंके कारण वायुमंडलकी शुद्धि होती है और जन्मदिवसपर पधारे अन्य जीवोंको भी इस सात्त्विकताका लाभ मिलता है ।
जिसका जन्मदिन है, उसे कुछ भेंटवस्तु देनी चाहिए । इस विषयमें आगे दिए अनुसार दृष्टिकोण रखें । छोटे बालकको प्रोत्साहित करनेके लिए भेंट दें, बडोंको भेंट देनेमें कर्त्तापन न रखें । अपेक्षारहित दान करनेसे हम कुछ कालोपरांत उसके बारेमें भूल भी जाते हैं । दानके विषयमें कर्त्तापन अथवा अपेक्षा रखनेसे लेन-देनका हिसाब निर्माण होता है । दान अथवा भेंट स्वीकारनेवाला व्यक्ति यदि ऐसा भाव रखे कि, `यह ईश्वरकृपासे मिला प्रसाद है', तो लेन-देनका हिसाब निर्माण नहीं होता ।
जन्मदिनपर जिन वस्त्रोंको धारण कर स्नान किया जाता है, उन वस्त्रोंका स्वयं उपयोग न कर अपेक्षारहित किसीको दान देना चाहिए । दान सदैव `सत्पात्रे दानम्' हो, इस हेतु भिखारी इत्यादिको देनेकी अपेक्षा ईश्वरके उपासक अथवा राष्ट्र व धर्महितके लिए कार्य करनेवालोंको देना पुण्यदायी होता है ।
पूर्वकालमें सर्व जीव साधनारत थे; इसलिए उनकी वृत्ति सात्त्विक थी । उनके द्वारा दान किए गए वस्त्र परिधान करनेवाले जीवको उपरोक्तानुसार लाभ होता था । त्रेतायुगमें गुरुकुलमें अपने गुरुके जन्मदिनपर उन्हें स्नान करवाकर, उनके द्वारा दिए गए वस्त्रोंका उपयोग करने योग्य बनना, शिष्य-धर्मका प्रतीक माना जाता था ।
३. जन्मदिनपर कुछ निषिद्ध कृतियां व उनका आधारभूत शास्त्र
शास्त्रके अनुसार कुछ निषिद्ध कृतियां: जन्मदिनपर नाखून एवं बाल काटना, वाहनसे यात्रा करना, कलह, हिंसाकर्म, अभक्ष्यभक्षण (न खाने योग्य पदार्थ खाना), अपेयपान (न पीने योग्य पदार्थ पीना), स्त्रीसंपर्क (स्त्रीके साथ शारीरिक संबंध) इत्यादि कृतियोंसे प्रयत्नपूर्वक बचें ।
जन्मदिनपर प्रज्वलित किए गए दीपकको न बुझाएं: दीपककी ज्योतिकी तुलना जीवके शरीरके पंचप्राणोंकी ऊर्जापर आधारित स्थूल कार्यसे की गई है । जीवकी देहके पंचप्राणोंका कार्य समाप्त होकर जीवकी प्राणशक्तिके पतन व उसकी जीवनज्योत शांत होनेका प्रतीक है दीपकका बुझना ।' प्रज्वलित दीपकका बुझना आकस्मिक मृत्यु, अर्थात् अपमृत्युसे संबंधित है; इस लिए इसे अशुभ माना गया है ।
जन्मदिनकी शुभकामनाएं रात्रिके १२ बजे न देकर सूर्योदय उपरांत देना: पश्चिमी संस्कृतिका अनुकरण कर अनेक लोग जन्मदिनकी शुभकामनाएं रात्रि १२ बजे देते हैं । रात्रिके १२ बजे वातावरणमें रज-तम कणोंकी मात्रा अधिक होती है, इसीलिए उस समय दी गई शुभकामनाएं फलदायी नहीं होती हैंण। हिंदू संस्कृतिके अनुसार दिन सूर्योदयसे आरंभ होता है । यह समय ऋषि-मुनियोंकी साधनाका समय है, इसलिए वातावरणमें सात्त्विकता अधिक होती है और सूर्योदयके पश्चात् दी गई शुभकामनाएं फलदायी सिद्ध होती हैं । अत: जन्मदिनकी शुभकामनाएं सूर्योदयके पश्चात् ही दें ।
मोमबत्ती जलाकर जन्मदिन न मनाना: पश्चिमी संस्कृतिका अंधानुकरण कर अनेक लोग मोमबत्तियां जलाकर एवं केक काटकर जन्मदिन मनाते हैं । मोमबत्ती तमोगुणी होती है; उसे जलानेसे कष्टदायक स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं । उसी प्रकार हिंदू धर्ममें `ज्योत बुझाने' की कृति अशुभ एवं त्यागने योग्य मानी गई है । इसीलिए जन्मदिनपर मोमबत्ती जलानेके उपरांत उसे जानबूझकर न बुझाएं ।
केक काटकर जन्मदिन न मनाना: `केकपर छुरी चलाना' अशुभ क्रियाका प्रतीक है । इसलिए जन्मदिनके शुभ अवसरपर ऐसी कृतिसे आगेकी पीढीपर कुसंस्कार होते हैं । आरतीके पश्चात् आकृष्ट ईश्वरीय चैतन्यको ग्रहण करते समय ऐसे विधिकर्म करना, उस चैतन्यमें कष्टदायक स्पंदनोंद्वारा बाधा उत्पन्न करनेके समान है । किसी भी शुभावसरपर जानबूझकर इस प्रकारकी लयकारी विधि करना धर्मविघातक प्रवृत्तिका लक्षण है ।
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अधिक जानकारी हेतु अवश्य पढे सनातनका ग्रंथ - |
सनातन संस्था विश्वभरमें धर्मजागृति व धर्मप्रसारका कार्य करती है । इसीके अंतर्गत इस लेखमें `जनमदिन मनानेकी योग्य पद्धति व उसके लाभ' इस विषयपर अंशमात्र जानकारी प्रस्तुत की गई है । अधिक जानकारीके लिए संपर्क करें: sanatan@sanatan.org

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