अक्षय तृतीया (Akshay Tritiya)

सारणी

१. प्रस्तावना
२. साढे तीन मुहूर्तोंमें से एक है अक्षय तृतीयाका दिन !
३. अक्षय तृतीयाका महत्त्व
४. त्यौहार मनानेकी पद्धति
५. पूर्वजोंको गति मिले, इस हेतु अक्षय तृतीयापर तिलतर्पण आवश्यक
       ५.१ तिलतर्पणका अर्थ व भावार्थ
       ५.२ पूर्वजोंको तिलतर्पण करनेका महत्त्व व पद्धति
६. देवता व पूर्वजोंको किए तिलतर्पणके कारण साधकपर शेष देवऋण तथा पितरऋण कुछ मात्रामें कम होता है
७. अक्षय तृतीयापर दान देनेका महत्त्व

८. अक्षयतृतीयापर किए जानेवाले तिलतर्पणकी मानसविधि करते समय दम घुटना व कोई गला दबा रहा है, ऐसा अनुभव होना


१. प्रस्तावना

वैशाख शुक्ल पक्षकी तृतीयाको अक्षय तृतीया कहते हैं । परशुरामका जन्म होनेके कारण इसे परशुराम तीज भी कहते हैं । इसी दिन त्रेतायुगका आरंभ हुआ था । इस दिन गंगा स्नान व भगवान कृष्णको चंदन लगानेका विशेष महत्त्व है । इसी विशेष पर्वपर भगवान बद्रीनाथजीके मंदिरके द्वार भी खुलते हैं और श्रद्धालुओंको उनके दर्शनका लाभ मिलता है । इस दिन भगवानको भिगोई गई चनेकी दाल व मिश्रीका भोग लगाया जाता है ।

२. साढे तीन मुहूर्तोंमें से एक है अक्षय तृतीयाका दिन !

साढे तीन मुहूर्तोंके अंतर्गत अक्षय तृतीया, संवत्सरारंभ (गुढी पाढवा) और दशहरा, प्रत्येकका एक दिन एवं बलिप्रतिपदाका आधा दिन, इस प्रकार वर्षभरमें साढे तीन दिनोंके मुहूर्त होते हैं । इन दिनोंकी विशेषता यह है कि किसी भी शुभकार्यके लिए मुहूर्त देखनेकी आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि इन विशिष्ट दिनोंका प्रत्येक क्षण ही मुहूर्त होता है ।

 अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं ।
 तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया ।
 उद्दिश्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यै: ।
 तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव ।। – मदनरत्न

अर्थ : भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठरसे कहते हैं, हे राजन इस तिथिपर किए गए दान व हवनका क्षय नहीं होता है; इसलिए हमारे ऋषि-मुनियोंने इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहा है । इस तिथिपर भगवानकी कृपादृष्टि पाने एवं पितरोंकी गतिके लिए की गई विधियां अक्षय-अविनाशी होती हैं । 

३. अक्षय तृतीयाका महत्त्व

अक्षय तृतीयापर ब्रह्मा व श्रीविष्णुकी मिश्रित तरंगें उच्च देवताओंके लोकसे अर्थात् सगुण लोकसे पृथ्वीपर आती हैं और इसके परिणामस्वरूप पृथ्वीकी सात्त्विकतामें १० प्रतिशत वृद्धि होती है । जब श्रद्धालु संपूर्ण भक्ति-भावसे भगवानकी आराधना करता है तब नित्य सुख व समृद्धि प्रदान करनेवाले इष्ट देवताकी कृपादृष्टि सदैव उसपर बनी रहती है । इस दिन पूर्वजोंको गति दिलाने हेतु तिलतर्पण किया जाता है ।

४. त्यौहार मनानेकी पद्धति

स्नानदानादि धर्मकृत्य : किसी भी कालखंडका प्रारंभदिन भारतीयोंको सदैव पवित्र प्रतीत होता है । इस तिथिपर स्नान, दान इत्यादि धर्मकृत्य बताए गए हैं । सबसे पहले पवित्र जलसे स्नान करके श्रीविष्णुकी पूजा की जाती है । होम-हवन, नामजप एवं दान करनेके उपरांत पितृतर्पण करते हैं । ऐसी मान्यता है कि, इस दिन अपिंडक श्राद्ध करना चाहिए यानी बिना पिंड दिए विधिपूर्वक ब्राह्मणभोजन करवाएं और यदि यह संभव न हो, तो कमसे कम तिल तर्पण करें । दानमें कलश, पंखा, खडाऊं, सत्तू, ककडी, खरबूजा आदि फल, शक्कर आदि दान करनेकी भी प्रथा है । इस दिन धूपसे सुरक्षा करनेवाली वस्तुएं जैसे छाता इत्यादि भी दान करनी चाहिए ।

हलदी-कुमकुम : स्त्रियोंके लिए यह दिन महत्त्वपूर्ण होता है । चैत्र मासमें स्थापित चैत्रगौरीका इस दिन विसर्जन किया जाता है । इस निमित्त वे हलदी-कुमकुम भी करती हैं ।’ (हलदी-कुमकुम एक प्रथा है, जिसमें सुहागिन नारी अपने घरमें अन्य सुहागिनोंको बुलाकर, उन्होंने देवीका रूप मानकर, उन्हें हलदी-कुमकम लगाकर व प्रणाम कर कोई भेंटवस्तु देती है ।)

५. पूर्वजोंको गति मिले, इस हेतु अक्षय तृतीयापर तिलतर्पण आवश्यक

५.१ तिलतर्पणका अर्थ व भावार्थ

तिलतर्पणमें देवता व पूर्वजोंको तिल तथा जल अर्पित किया जाता है । तिल सात्त्विकताका प्रतीक है और जल शुद्ध भावका प्रतीक है । तिलतर्पणका अर्थ है, देवताको तिलके रूपमें कृतज्ञता तथा शरणागत भाव अर्पण करना । भगवानके पास तो सबकुछ है । अत: हम उसे क्या अर्पण कर सकते हैं ? ‘मैं ईश्वरको कुछ अर्पण कर रहा हूं’ यह अहं भी नहीं होना चाहिए । अत: तिल अर्पण करते समय भाव रखें कि, ‘ईश्वर ही मुझसे सब करवा रहे हैं’। इससे तिलतर्पणके समय साधकका अहं नहीं बढेगा व उसके भावमें वृद्धि होगी ।

५.२ पूर्वजोंको तिलतर्पण करनेका महत्त्व व पद्धति

महत्त्व : अक्षय तृतीयापर उच्च लोकोंसे सात्त्विकता प्रक्षेपित होती है । इसीलिए इस दिन भुवलोकके अनेक जीव सात्त्विकता ग्रहण करनके लिए पृथ्वीके समीप आते हैं । भुवलोकके ये अधिकांश जीव पूर्वज ही होते हैं । इस प्रकार उनके पृथ्वीके निकट आनेसे अक्षय तृतीयापर मनुष्यको अधिक कष्ट होनेकी संभावना होती है । पूर्वजोंका ऋण भी (हमपर) मनुष्यपर अधिक होता है । अत: पूर्वजोंको गति प्राप्त हो, इसलिए अक्षय तृतीयापर तिलतर्पण आवश्यक है ।

पद्धति : सर्वप्रथम तिलमें श्रीविष्णु व ब्रह्माके तत्त्व आने हेतु देवताओंसे प्रार्थना करें । फिर एक पात्रमें पूर्वजोंका आवाहन करें । तदुपरांत भाव रखें कि, ‘पूर्वज सूक्ष्मरूपसे पधारे हैं तथा हम उनके चरणोंमें तिल एवं जल अर्पण कर रहे हैं ‘। दो मिनट बाद देवताओंके तत्त्वोंसे अभिमंत्रित अक्षत पूर्वजोंको अर्पण करें । सात्त्विक बने तिल हाथमें लेकर उन्हें धीरे-धीरे पात्रमें जलके साथ छोडे । पूर्वजोंको गति प्रदान करने हेतु दत्त, ब्रह्मा अथवा श्रीविष्णुसे प्रार्थना करें । 

परिणाम : पात्रमें सूक्ष्मसे पूर्वज पधारते हैं । तिलमें सात्त्विकता ग्रहण करने व रज-तम नष्ट करनेकी क्षमता अधिक होती है ।  जब व्यक्ति भक्तिभावसे तिलतर्पण करता है, तो पात्रमें सूक्ष्मसे पधारे पूर्वजोंके प्रतीकात्मक सूक्ष्म-देहपर विद्यमान काला आवरण दूर होता है । उनके सूक्ष्म-देहकी सात्त्विकता बढती है और अगले लोकमें जानेके लिए आवश्यक उर्जा उन्हें प्राप्त होती है । जिससे पितृदोष ५ से १० प्रतिशत कम होता है । प्रथम देवताओंको तिल अर्पण करनेसे साधकको सात्त्विकता प्राप्त होती है । यदि उसका भाव ४० प्रतिशतसे अधिक हो, तो उसके आसपास भगवान सूक्ष्मसे संरक्षककवच निर्माण करते हैं । परिणामस्वरूप पूर्वजोंको तिलतर्पण करते समय साधकको कष्ट नहीं होते ।

६. देवता व पूर्वजोंको किए तिलतर्पणके कारण साधकपर शेष देवऋण तथा पितरऋण कुछ मात्रामें कम होता है

अक्षय तृतीयापर सात्त्विकता बढनेसे आनंदकी मात्रा सामान्यत: ६० से ७० प्रतिशत होती है व पूर्वजोंकी अतृप्तिके कारण होनेवाले कष्टोंकी मात्रा ३० से ४० प्रतिशत होती है । अत: अक्षय तृतीयापर देवता व पूर्वजोंको किए तिलतर्पणके कारण साधकपर शेष देवऋण तथा पितरऋण भी कुछ मात्रामें कम होता है । साधकद्वारा प्रामाणिकतासे, मनसे तथा भावपूर्ण पद्धतिसे तिलतर्पण करनेपर देवता तथा पूर्वज उसपर प्रसन्न होते हैं । उसकी साधना अच्छी हो और सांसारिकी अडचनें दूर हों, ऐसा वे उसे आशीर्वाद देते हैं ।  अक्षय तृतीयापर सात्त्विकता प्रक्षेपित होनेसे अच्छा लगनेकी मात्रा सामान्यत: ६० से ७० प्रतिशत होती है व पूर्वजोंके कष्टकी मात्रा ३० से ४० प्रतिशत होती है ।

७. अक्षय तृतीयापर दान देनेका महत्त्व

दान देनेसे पुण्य मिलता है । इस दिन दिए दानका कभी क्षय नहीं होता । जब पुन्योंकी मात्रा बढ जाती है तब उस व्याक्तिद्वारा पिछले जीवन अथवा जन्मोंमें हुए पापकर्म क्षीण होते हैं और उसके पुण्यका संचय बढता है । उसे स्वर्गकी प्राप्ति भी हो सकती है; परंतु खरे साधक को पुण्य संचित कर स्वर्ग पाने में कोई रुचि नहीं होती है । उनका एकमेव ध्येय ईश्वरप्राप्ति करनी होती है । इसलिए साधकोंको सत्पात्रको ही दान देना चाहिए । यहां सत्पात्रको दान देने का अर्थ है, अध्यात्मके प्रसारके साथ-साथ राष्ट्र और धर्मके लिए होनेवाले सत्के कार्यमें दान देना । सत्पात्रको दान देनेसे दान करनेवालेको पुण्य प्राप्त होनेकी बजाय दानका कर्म, ‘अकर्म-कर्म’ हो जाता है । अत: उसकी आध्यात्मिक उन्नति होती है । आध्यात्मिक उन्नति होनेपर साधक स्वर्गलोकमें जानेकी बजाय उच्च लोकोंमें जाते हैं ।

८. अक्षयतृतीयापर किए जानेवाले तिलतर्पणकी मानसविधि करते समय दम घुटना व कोई गला दबा रहा है, ऐसा अनुभव होना

 ‘१९.४.२००७ को प्रात: ९ बजे मैं रेलगाडीमें यात्रा करते समय ‘दैनिक सनातन प्रभात’का ‘अक्षय-तृतीया विशेषांक’ पढ रहा था । तदुपरांत मैं गाडीमें बैठकर उसमें बताए अनुसार अक्षय तृतीयापर की जानेवाली तिलतर्पणकी मानस विधि करने लगा । तिलतर्पण विधिकी सर्व कृतियां मेरेद्वारा भावपूर्ण हो रही थीं । तदपुरांत जब मैं तर्पण हेतु पितरोंका आवाहन करने लगा तो २ मिनटके लिए मेरा दम घुटने लगा व कोई मेरा गला दबा रहा है, ऐसा लगा । मैंने तत्काल श्रीकृष्णसे प्रार्थना कर मुझे कष्ट देनेवाले मांत्रिकपर शस्त्र छोडनेके लिए कहा । उस समय ऐसा अनुभव हुआ कि सुनहरी किरणोंके समान कुछ मेरी गर्दनमें प्रविष्ट हुआ और मेरा कष्ट थम गया । तदुपरांत मैंने शेष विधियां की । सर्व कृति करनेके उपरांत ऐसा लगा कि मेरे आसपास आया काला आवरण दूर हो गया है ।’  – श्री. नंदकिशोर नारकर, कळवा, ठाणे. (संदर्भ : सनातनका ग्रंथ – ‘त्योहार धार्मिक उत्सव व व्रत’)

 


अधिक जानकारी हेतु अवश्य पढे सनातनका ग्रंथ – त्योहार धार्मिक उत्सव व व्रत

सनातन संस्था विश्वभरमें धर्मजागृति व धर्मप्रसारका कार्य करती है । इसीके अंतर्गत इस लेखमें ‘हिंदू संस्कृतिके प्रतीक नमस्कार संबंधी जानकारी, नमस्कारकी योग्य पद्धति तथा नमस्कार करनेपर होनेवाले लाभ’ इस विषयपर अंशमात्र जानकारी प्रस्तुत की गई है । अधिक जानकारीके लिए संपर्क करें :  sanatan@sanatan.org

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